दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
DevanagariHindipublished196 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १३६—नीच पुरुषकी नीचता | १२६ | १५०—भूप-दरबारकी निन्दा | १३१ |
| १३७—सज्जनकी सज्जनता | १२६ | १५१—छल-कपट सर्वत्र | |
| १३८—नीचनिन्दा | १२७ | वर्जित है | १३२ |
| १३९—सज्जन-महिमा | १२८ | १५२—जगत्में सब सीधोंको | |
| १४०—दुर्जनोंका स्वभाव | १२८ | तंग करते हैं | १३३ |
| १४१—नीचकी निन्दासे उत्तम | १५३—दुष्टनिन्दा | १३३ | |
| पुरुषोंका कुछ नहीं | १५४—कपटीको पहचानना | ||
| घटता | १२८ | बड़ा कठिन है | १३७ |
| १४२—गुणोंका ही मूल्य है. | १५५—कपटीसे सदा डरना | ||
| दूसरोंके आदर- | चाहिये | १३७ | |
| अनादरका नहीं | १२९ | १५६—कपट ही दुष्टताका | |
| १४३—श्रेष्ठ पुरुषोंकी महिमा- | स्वरूप है | १३८ | |
| को कोई नहीं पा सकता | १२९ | १५७—कपटी कभी सुख नहीं | |
| १४४—दुष्ट पुरुषोंद्वारा की हुई | पाता | १३८ | |
| निन्दा-स्तुतिका कोई | १५८—पापही दुःखका मूल है | १३८ | |
| मूल्य नहीं है | १२९ | १५९—अविवेक ही दुःखका | |
| १४५—डाह करनेवालोंका कभी | मूल है | १३९ | |
| कल्याण नहीं होता | १३० | १६०—विपरीत बुद्धि विनाश- | |
| १४६—दूसरोंकी निन्दा करने- | का लक्षण है | १४० | |
| वालोंका मुंह काला | १६१—जोशमें आकर अनधि- | ||
| होता है | १३० | कार कार्य करनेवाला | |
| १४७—मिथ्या अभिमानका | पछताता है | १४१ | |
| दुष्परिणाम | १३० | १६२—समयपर कष्ट सह लेना | |
| १४८—नीचा बनकर रहना | हितकर होता है | १४१ | |
| ही श्रेष्ठ है | १३१ | १६३—भगवान् सबके रक्षक हैं | १४२ |
| १४९—सज्जन स्वाभाविक ही | १६४—लड़ना सर्वथा त्याज्य है | १४२ | |
| पूजनीय होते हैं | १३१ |