दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ दोहावली (राम) के दोनों अक्षरोंमें एक 'र' तो (रेफ ॔ के रूपमें) सब वर्णोंके मस्तकपर छत्रकी भांति विराजता है और दूसरा 'म' (अनुस्वार, के रूपमें) सबके ऊपर मुकुट-मणिके समान सुशोभित होता है ॥९॥ नाम रामको अंक है सब साधन हैं सून। अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून ॥१०॥ भावार्थ—श्रीरामजीका नाम अङ्क है और सब साधन शून्य (०) हैं। अङ्क न रहनेपर तो कुछ भी हाथ नहीं लगता, परंतु शून्यके पहले अङ्क आनेपर वे दसगुने हो जाते हैं (अर्थात् रामनामके जपके साथ जो साधन होते हैं, वे दसगुने लाभदायक हो जाते हैं), परंतु रामनामसे हीन जो साधन होता है वह कुछ भी फल नहीं देता ॥१०॥ नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ॥११॥ भावार्थ—कलियुगमें श्रीरामजीका नाम कल्पवृक्ष (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) है और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे तुलसीदास भाँगसे (विषयमदसे भरी और दूसरोंको भी विषयमद उपजानेवाली साधुओंद्वारा त्याज्य स्थितिसे) बदलकर तुलसीके समान (निर्दोष, भगवानका प्यारा, सबका आदरणीय और जगतको पावन करनेवाला) हो गया ॥११॥ राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि। तुलसी इहाँ जो आलसी गयो आजु की कालि ॥१२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जीभसे रामनामका जप करके लोग पुण्यात्मा और परम सुखी हो गये; परंतु इस नाम- जपमें जो आलस्य करते हैं, उन्हें तो आज या कल नष्ट ही हुआ