भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली १७

समझो ॥१२॥ नाम गरीबनवाज को राज देत जन जानि । तुलसी मन परिहरत नहिं घूर बिनिआ की बानि ॥१३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गरीबनवाज (दीनबन्धु) श्रीरामजीका नाम ऐसा है, जो जपनेवालेको भगवान्‌का निज जन जानकर राज्य (प्रजापतिका पद या मोक्ष-साम्राज्यतक) दे डालता है। परंतु यह मन ऐसा अविश्वासी और नीच है कि घूरे (कूड़ेके ढेर) में पड़े दाने चुगनेकी ओछी आदत नहीं छोड़ता (अर्थात् गंदे विषयोंमें ही सुख खोजता है) ॥१३॥ कासीं बिधि बसि तनु तजैं हठि तनु तजैं प्रयाग । तुलसी जो फल सो सुलभ राम नाम अनुराग ॥१४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि काशीजीमें (पापोंसे बचते हुए) विधिवत् निवास करके शरीर त्यागनेपर और तीर्थराज प्रयागमें हठसे शरीर छोड़नेपर जो (मोक्षरूपी) फल मिलता है, वह रामनाममें अनुराग होनेसे सुगमतासे मिल जाता है। [यही नहीं; अनुरागपूर्वक रामनामके जापसे तो मोक्षके आधार साक्षात् भगवान्- की प्राप्ति हो जाती है] ॥१४॥ मीठो अरु कठवति भरो रौंताई अरु छेम । स्वारथ परमारथ सुलभ राम नाम के प्रेम ॥१५॥ भावार्थ—(१) मीठा पदार्थ (अमृत) भी हो और कठौता भर- कर मिले, (२) राज्यादि अधिकार भी प्राप्त हों और क्षेमकुशल भी रहे (अर्थात् अभिमान और भोगोंसे बचकर रहा जाय) और (३) स्वार्थ भी सधे तथा परमार्थ भी सम्पन्न हो—ऐसा होना बहुत ही कठिन है; परंतु श्रीरामनामके प्रेमसे ये परस्परविरोधी