भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 196 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 22

१८ दोहावली दुर्लभ बातें भी सुलभ हो जाती हैं (अर्थात् रामनाममें प्रेम होनेसे मधुर सुख भी मिलते हैं और वे दुःखरहित भरपूर होते हैं; राज्य भी मिल सकता है और उसमें अभिमान तथा विषयासक्तिका अभाव होनेके कारण गिरनेकी भी गुंजाइश नहीं रहती, पारमार्थिक स्थितिपर अचल रहते हुए भी राज्य-शासन किया जा सकता है और परमार्थ ही स्वार्थ बन जाता है) ॥१५॥ राम नाम सुमिरत सुजस भाजन भए कुजाति । कुतरुक सुरपुर राजमग लहत भुवन बिख्याति ॥१६॥ भावार्थ—रामनामका स्मरण करनेसे (गणिका एवं अजामिल आदि) नीच जाति या नीच स्वभाववाले भी सुन्दर कीर्तिके पात्र हो गये। स्वर्गके राजमार्ग (गङ्गाजीके तट) पर स्थित बुरे वृक्ष भी त्रिभुवनमें ख्याति पा जाते हैं ॥१६॥ स्वारथ सुख सपनेहुँ अगम परमारथ न प्रबेस । राम नाम सुमिरत मिटहिं तुलसी कठिन कलेस ॥१७॥ भावार्थ—जिन लोगोंको सांसारिक सुख सपनेमें भी नहीं मिलते और परमार्थमें—मोक्षप्राप्तिके मार्गमें जिनका प्रवेश नहीं है, तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामनामका स्मरण करनेसे उनके भी कठिन क्लेश मिट जाते हैं (अर्थात् उनके स्वार्थ-परमार्थ दोनोंकी सिद्धि सहजहीमें हो जाती है) ॥१७॥ मोर मोर सब कहँ कहसि तू को कहु निज नाम । कै चुप साधहि सुनि समुझि कै तुलसी जपु राम ॥१८॥ भावार्थ—तू सबको मेरा-मेरा कहता है, परंतु यह तो बता कि तू कौन है ? और तेरा अपना नाम क्या है ? तुलसीदासजी कहते हैं कि अब या तो तू इसको (नाम और रूपके रहस्यको) सुन और