भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

दोहावली १९ समझकर मौन हो जा (मेरा-मेरा कहना छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित हो जा) या श्रीरामजीका नाम जप ॥ १८ ॥ हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच । तुलसी अलखहि का लखहि राम नाम जप नीच ॥ १९॥ भावार्थ—[एक साधनहीन 'अलखिया' साधु केवल 'अलख- अलख' चिल्लाया करता था, उसे फटकारते हुए तुलसीदासजी कहते हैं कि] तू पहले अपने स्वरूपको जान, फिर अपने यथार्थ 'अपने' ब्रह्मके स्वरूपका अनुभव कर। तदनन्तर अपने और ब्रह्मके बीचमें रहनेवाली मायाको पहचान। अरे नीच ! [इन तीनोंको समझे बिना] तू उस अलख परमात्माको क्या समझ सकता है ? अतः ['अलख-अलख' चिल्लाना छोड़कर] रामनामका जप कर ॥ १९ ॥ राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस । बरषत बारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास ॥ २०॥ भावार्थ—जो रामनामका सहारा लिये बिना ही परमार्थकी— मोक्षकी आशा करता है, वह तो मानो बरसते हुए बादलकी बूँदको पकड़कर आकाशमें चढ़ना चाहता है (अर्थात् जैसे वर्षाकी बूँदको पकड़कर आकाशपर चढ़ना असम्भव है, वैसे ही रामनामका जप किये बिना परमार्थकी प्राप्ति असम्भव है) ॥ २० ॥ तुलसी हठि हठि कहत नित चित सुनि हित करि मानि । लाभ राम सुमिरन बड़ो बड़ी बिसारें हानि ॥ २१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी नित्य-निरन्तर बड़े आग्रहके साथ कहते हैं कि हे चित्त ! तू मेरी बात सुनकर उसे हितकारी समझ। रामका स्मरण ही बड़ा भारी लाभ है और उसे भुलानेमें ही सबसे बड़ी हानि है ॥ २१ ॥