दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० दोहावली बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु ॥२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तू कुसङ्गतिको और चित्तके सारे बुरे विचारोंको त्यागकर रामका बन जा और उनके नामका जप कर। ऐसा करनेसे तेरी अनेकों जन्मोंकी बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर जा सकती है ॥२२॥ प्रीति प्रतीति सुरीति सों राम राम जपु राम। तुलसी तेरो है भलो आदि मध्य परिनाम ॥२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तुम प्रेम, विश्वास और विधिके साथ (नामापराधोंसे बचते हुए) राम-राम-राम जपो; इससे तुम्हारा आदि, मध्य और अन्त तीनों ही कालोंमें कल्याण है ॥२३॥ दंपति रस रसना दसन परिजन बदन सुगेह। तुलसी हर हित बरन सिसु संपति सहज सनेह ॥२४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रस (रामनामका उच्चारण करते समय जिस मिठासका अनुभव होता है) और रसना (जीभ) पति-पत्नी हैं, दांत कुटुम्बी हैं, मुख सुन्दर घर है, श्रीमहादेवजीके प्यारे 'र' और 'म'—ये दोनों अक्षर दो मनोहर बालक हैं और सहज स्नेह ही सम्पत्ति हैं (परमार्थ-साधककी ऐसी ही गृहस्थी होनी चाहिये) ॥२४॥ बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास। रामनाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥२५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा-ऋतु है, उत्तम सेवकगण (प्रेमी भक्त) धान हैं और रामनामके दो सुन्दर अक्षर ('र' और 'म') सावन-भादोंके महीने हैं (अर्थात्