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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली ३५ मुखरूपी दरवाजेकी देहलीपर रामनामरूपी [हवाके झोंके अथवा तेलकी कमीसे कभी न बुझनेवाला नित्य प्रकाशमय] मणिदीप रख दो (अर्थात् जीभके द्वारा अखण्डरूपसे श्रीराम-नामका जप करता रह) ॥६॥ हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम । मनहुँ पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम ॥७॥ भावार्थ—हृदयमें निर्गुण ब्रह्मका ध्यान, नेत्रोंके सामने प्रथम तीन दोहोंमें कथित सगुण स्वरूपकी सुन्दर झाँकी और जीभसे सुन्दर राम-नामका जप करना। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह ऐसा है मानो सोनेकी सुन्दर डिबियामें मनोहर रत्न सुशोभित हो। श्रीगुसाईंजीके मतसे 'राम' नाम निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान् दोनोंसे बड़ा है—'मोरें मत बड़ नाम दुहू तें'। नामकी इसी महिमाको लक्ष्यमें रखकर यहाँ नामको रत्न कहा गया है तथा निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान्‌को उस अमूल रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये सोनेका सम्पुट (डिबियाके नीचे-ऊपरके भाग) बताया गया है॥७॥ सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि । तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि ॥८॥ भावार्थ—सगुणरूपके ध्यानमें तो प्रीतियुक्त रुचि नहीं है और निर्गुणस्वरूप मनसे दूर है (यानी समझमें नहीं आता) । तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसी दशामें रामनाम-स्मरणरूपी संजीवनी बूटीका सदा सेवन करो ॥८॥ एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ । तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—देखो, श्रीरघुनाथजीके नाम

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