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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

दोहावली ३५ मुखरूपी दरवाजेकी देहलीपर रामनामरूपी [हवाके झोंके अथवा तेलकी कमीसे कभी न बुझनेवाला नित्य प्रकाशमय] मणिदीप रख दो (अर्थात् जीभके द्वारा अखण्डरूपसे श्रीराम-नामका जप करता रह) ॥६॥ हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम । मनहुँ पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम ॥७॥ भावार्थ—हृदयमें निर्गुण ब्रह्मका ध्यान, नेत्रोंके सामने प्रथम तीन दोहोंमें कथित सगुण स्वरूपकी सुन्दर झाँकी और जीभसे सुन्दर राम-नामका जप करना। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह ऐसा है मानो सोनेकी सुन्दर डिबियामें मनोहर रत्न सुशोभित हो। श्रीगुसाईंजीके मतसे 'राम' नाम निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान् दोनोंसे बड़ा है—'मोरें मत बड़ नाम दुहू तें'। नामकी इसी महिमाको लक्ष्यमें रखकर यहाँ नामको रत्न कहा गया है तथा निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान्‌को उस अमूल रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये सोनेका सम्पुट (डिबियाके नीचे-ऊपरके भाग) बताया गया है॥७॥ सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि । तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि ॥८॥ भावार्थ—सगुणरूपके ध्यानमें तो प्रीतियुक्त रुचि नहीं है और निर्गुणस्वरूप मनसे दूर है (यानी समझमें नहीं आता) । तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसी दशामें रामनाम-स्मरणरूपी संजीवनी बूटीका सदा सेवन करो ॥८॥ एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ । तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—देखो, श्रीरघुनाथजीके नाम

१६ दोहावली (राम) के दोनों अक्षरोंमें एक 'र' तो (रेफ ॔ के रूपमें) सब वर्णोंके मस्तकपर छत्रकी भांति विराजता है और दूसरा 'म' (अनुस्वार, के रूपमें) सबके ऊपर मुकुट-मणिके समान सुशोभित होता है ॥९॥ नाम रामको अंक है सब साधन हैं सून। अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून ॥१०॥ भावार्थ—श्रीरामजीका नाम अङ्क है और सब साधन शून्य (०) हैं। अङ्क न रहनेपर तो कुछ भी हाथ नहीं लगता, परंतु शून्यके पहले अङ्क आनेपर वे दसगुने हो जाते हैं (अर्थात् रामनामके जपके साथ जो साधन होते हैं, वे दसगुने लाभदायक हो जाते हैं), परंतु रामनामसे हीन जो साधन होता है वह कुछ भी फल नहीं देता ॥१०॥ नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ॥११॥ भावार्थ—कलियुगमें श्रीरामजीका नाम कल्पवृक्ष (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) है और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे तुलसीदास भाँगसे (विषयमदसे भरी और दूसरोंको भी विषयमद उपजानेवाली साधुओंद्वारा त्याज्य स्थितिसे) बदलकर तुलसीके समान (निर्दोष, भगवानका प्यारा, सबका आदरणीय और जगतको पावन करनेवाला) हो गया ॥११॥ राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि। तुलसी इहाँ जो आलसी गयो आजु की कालि ॥१२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जीभसे रामनामका जप करके लोग पुण्यात्मा और परम सुखी हो गये; परंतु इस नाम- जपमें जो आलस्य करते हैं, उन्हें तो आज या कल नष्ट ही हुआ

दोहावली १७

समझो ॥१२॥ नाम गरीबनवाज को राज देत जन जानि । तुलसी मन परिहरत नहिं घूर बिनिआ की बानि ॥१३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गरीबनवाज (दीनबन्धु) श्रीरामजीका नाम ऐसा है, जो जपनेवालेको भगवान्‌का निज जन जानकर राज्य (प्रजापतिका पद या मोक्ष-साम्राज्यतक) दे डालता है। परंतु यह मन ऐसा अविश्वासी और नीच है कि घूरे (कूड़ेके ढेर) में पड़े दाने चुगनेकी ओछी आदत नहीं छोड़ता (अर्थात् गंदे विषयोंमें ही सुख खोजता है) ॥१३॥ कासीं बिधि बसि तनु तजैं हठि तनु तजैं प्रयाग । तुलसी जो फल सो सुलभ राम नाम अनुराग ॥१४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि काशीजीमें (पापोंसे बचते हुए) विधिवत् निवास करके शरीर त्यागनेपर और तीर्थराज प्रयागमें हठसे शरीर छोड़नेपर जो (मोक्षरूपी) फल मिलता है, वह रामनाममें अनुराग होनेसे सुगमतासे मिल जाता है। [यही नहीं; अनुरागपूर्वक रामनामके जापसे तो मोक्षके आधार साक्षात् भगवान्- की प्राप्ति हो जाती है] ॥१४॥ मीठो अरु कठवति भरो रौंताई अरु छेम । स्वारथ परमारथ सुलभ राम नाम के प्रेम ॥१५॥ भावार्थ—(१) मीठा पदार्थ (अमृत) भी हो और कठौता भर- कर मिले, (२) राज्यादि अधिकार भी प्राप्त हों और क्षेमकुशल भी रहे (अर्थात् अभिमान और भोगोंसे बचकर रहा जाय) और (३) स्वार्थ भी सधे तथा परमार्थ भी सम्पन्न हो—ऐसा होना बहुत ही कठिन है; परंतु श्रीरामनामके प्रेमसे ये परस्परविरोधी

१८ दोहावली दुर्लभ बातें भी सुलभ हो जाती हैं (अर्थात् रामनाममें प्रेम होनेसे मधुर सुख भी मिलते हैं और वे दुःखरहित भरपूर होते हैं; राज्य भी मिल सकता है और उसमें अभिमान तथा विषयासक्तिका अभाव होनेके कारण गिरनेकी भी गुंजाइश नहीं रहती, पारमार्थिक स्थितिपर अचल रहते हुए भी राज्य-शासन किया जा सकता है और परमार्थ ही स्वार्थ बन जाता है) ॥१५॥ राम नाम सुमिरत सुजस भाजन भए कुजाति । कुतरुक सुरपुर राजमग लहत भुवन बिख्याति ॥१६॥ भावार्थ—रामनामका स्मरण करनेसे (गणिका एवं अजामिल आदि) नीच जाति या नीच स्वभाववाले भी सुन्दर कीर्तिके पात्र हो गये। स्वर्गके राजमार्ग (गङ्गाजीके तट) पर स्थित बुरे वृक्ष भी त्रिभुवनमें ख्याति पा जाते हैं ॥१६॥ स्वारथ सुख सपनेहुँ अगम परमारथ न प्रबेस । राम नाम सुमिरत मिटहिं तुलसी कठिन कलेस ॥१७॥ भावार्थ—जिन लोगोंको सांसारिक सुख सपनेमें भी नहीं मिलते और परमार्थमें—मोक्षप्राप्तिके मार्गमें जिनका प्रवेश नहीं है, तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामनामका स्मरण करनेसे उनके भी कठिन क्लेश मिट जाते हैं (अर्थात् उनके स्वार्थ-परमार्थ दोनोंकी सिद्धि सहजहीमें हो जाती है) ॥१७॥ मोर मोर सब कहँ कहसि तू को कहु निज नाम । कै चुप साधहि सुनि समुझि कै तुलसी जपु राम ॥१८॥ भावार्थ—तू सबको मेरा-मेरा कहता है, परंतु यह तो बता कि तू कौन है ? और तेरा अपना नाम क्या है ? तुलसीदासजी कहते हैं कि अब या तो तू इसको (नाम और रूपके रहस्यको) सुन और

दोहावली १९ समझकर मौन हो जा (मेरा-मेरा कहना छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित हो जा) या श्रीरामजीका नाम जप ॥ १८ ॥ हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच । तुलसी अलखहि का लखहि राम नाम जप नीच ॥ १९॥ भावार्थ—[एक साधनहीन 'अलखिया' साधु केवल 'अलख- अलख' चिल्लाया करता था, उसे फटकारते हुए तुलसीदासजी कहते हैं कि] तू पहले अपने स्वरूपको जान, फिर अपने यथार्थ 'अपने' ब्रह्मके स्वरूपका अनुभव कर। तदनन्तर अपने और ब्रह्मके बीचमें रहनेवाली मायाको पहचान। अरे नीच ! [इन तीनोंको समझे बिना] तू उस अलख परमात्माको क्या समझ सकता है ? अतः ['अलख-अलख' चिल्लाना छोड़कर] रामनामका जप कर ॥ १९ ॥ राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस । बरषत बारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास ॥ २०॥ भावार्थ—जो रामनामका सहारा लिये बिना ही परमार्थकी— मोक्षकी आशा करता है, वह तो मानो बरसते हुए बादलकी बूँदको पकड़कर आकाशमें चढ़ना चाहता है (अर्थात् जैसे वर्षाकी बूँदको पकड़कर आकाशपर चढ़ना असम्भव है, वैसे ही रामनामका जप किये बिना परमार्थकी प्राप्ति असम्भव है) ॥ २० ॥ तुलसी हठि हठि कहत नित चित सुनि हित करि मानि । लाभ राम सुमिरन बड़ो बड़ी बिसारें हानि ॥ २१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी नित्य-निरन्तर बड़े आग्रहके साथ कहते हैं कि हे चित्त ! तू मेरी बात सुनकर उसे हितकारी समझ। रामका स्मरण ही बड़ा भारी लाभ है और उसे भुलानेमें ही सबसे बड़ी हानि है ॥ २१ ॥

२० दोहावली बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु ॥२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तू कुसङ्गतिको और चित्तके सारे बुरे विचारोंको त्यागकर रामका बन जा और उनके नामका जप कर। ऐसा करनेसे तेरी अनेकों जन्मोंकी बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर जा सकती है ॥२२॥ प्रीति प्रतीति सुरीति सों राम राम जपु राम। तुलसी तेरो है भलो आदि मध्य परिनाम ॥२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तुम प्रेम, विश्वास और विधिके साथ (नामापराधोंसे बचते हुए) राम-राम-राम जपो; इससे तुम्हारा आदि, मध्य और अन्त तीनों ही कालोंमें कल्याण है ॥२३॥ दंपति रस रसना दसन परिजन बदन सुगेह। तुलसी हर हित बरन सिसु संपति सहज सनेह ॥२४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रस (रामनामका उच्चारण करते समय जिस मिठासका अनुभव होता है) और रसना (जीभ) पति-पत्नी हैं, दांत कुटुम्बी हैं, मुख सुन्दर घर है, श्रीमहादेवजीके प्यारे 'र' और 'म'—ये दोनों अक्षर दो मनोहर बालक हैं और सहज स्नेह ही सम्पत्ति हैं (परमार्थ-साधककी ऐसी ही गृहस्थी होनी चाहिये) ॥२४॥ बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास। रामनाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥२५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा-ऋतु है, उत्तम सेवकगण (प्रेमी भक्त) धान हैं और रामनामके दो सुन्दर अक्षर ('र' और 'म') सावन-भादोंके महीने हैं (अर्थात्

दोहावली २१ जैसे वर्षा-ऋतुके श्रावण, भाद्रपद—इन दो महीनोंमें धान लहलहा उठता है, वैसे ही भक्तिपूर्वक श्रीरामनामका जप करनेसे भक्तोंको आत्यन्तिक सुख मिलता है) ॥ २५ ॥ राम नाम नर केसरी कनक कसिपु कलिकाल । जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल ॥२६॥ भावार्थ—श्रीरामनाम नृसिंहभगवान् हैं, कलियुग हिरण्यकशिपु है और श्रीरामनामका जप करनेवाले भक्तजन प्रह्लादजीके समान हैं जिनकी वह (रामनामरूपी नृसिंहभगवान्) देवताओंको दुःख देनेवाले हिरण्यकशिपुको (भक्तिके बाधक कलियुगको) मारकर रक्षा करेगा ॥ २६ ॥ राम नाम कलि कामतरु राम भगति सुरधेनु । सकल सुमंगल मूल जग गुरुपद पंकज रेनु ॥२७॥ भावार्थ—कलियुग में रामनाम मनचाहा फल देनेवाले कल्पवृक्षके समान है, रामभक्ति मुंहमांगी वस्तु देनेवाली कामधेनु है और श्रीसद्गुरुके चरणकमलकी रज संसारमें सब प्रकारके मङ्गलोंकी जड़ है ॥ २७ ॥ राम नाम कलि कामतरु सकल सुमंगल कंद । सुमिरत करतल सिद्धि सब पग पग परमानंद ॥२८॥ भावार्थ—श्रीरामका नाम कलियुगमें कल्पवृक्षके समान है और सब प्रकारके श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ मङ्गलोंका परम सार है। रामनामके स्मरणसे ही सब सिद्धियाँ वैसे ही प्राप्त हो जाती हैं, जैसे कोई चीज हथेलीमें ही रक्खी हो और पद-पदपर परम आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥

१२ दोहावली जथा भूमि सब बीजमय नखत निवास अकास । राम नाम सब धरममय जानत तुलसीदास ॥२९॥ भावार्थ—जैसे सारी धरती बीजमय है, सारा आकाश नक्षत्रोंका निवास (नक्षत्रमय) है, वैसे ही रामनाम सर्वधर्ममय है—तुलसीदास इस रहस्यको जानते हैं ॥ २९ ॥ सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन । नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन ॥३०॥ भावार्थ—जो समस्त (भोग और मोक्षकी भी) कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामजीके भक्तिरसमें डूबे हुए हैं, उन (नारद, वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास आदि) महात्माओंने भी रामनामके सुन्दर प्रेमरूपी अमृत-सरोवरमें अपने मनको मछली बना रक्खा है (अर्थात् नामामृत- के आनन्दको वे क्षणभरके लिये भी त्यागनेमें मछलीकी भाँति व्याकुल हो जाते हैं) ॥ ३० ॥ ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि । राम चरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥३१॥ भावार्थ—[निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] रामसे भी रामनाम बड़ा है, वह वर देनेवाले देवताओंको भी वर देनेवाला है। महान् ईश्वर श्रीशंकरजीने इस रहस्यको मनमें समझकर ही रामचरित्रके सौ करोड़ श्लोकोंमेंसे [चुनकर दो अक्षरके इस] रामनामको ही ग्रहण किया ॥ ३१ ॥ सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ । नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ ॥३२॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीने तो शबरी, [गीधराज] जटायु आदि अपने श्रेष्ठ सेवकोंको ही सुगति दी; परंतु रामनामने तो असंख्य

Wait, is there an upper loop? Wait, look at the line above it! Line 8: खजाना बन जाता है॥ ३३॥ Line 9: लंक बिभीषन राज कपि प... मारुति खग मीच । Above प... in line 8 is: जाता है! Wait, the (two matras) of है hangs down! DOES IT HANG DOWN? In है॥ ३३॥: जाता is above कपि. है is above प...! Wait! है has the double matra ! Does the tail of or something from line 8 hang down? Wait, है is above प...? Let's trace vertically: Line 7: ...समस्त सद्गुणों और श्रेष्ठ मङ्गलोंका Line 8: खजाना बन जाता है ॥ ३३ ॥ खजाना is under रामनामका स्मरण बन is under करते ही जाता is under समस्त है॥ is under सद्गुणों Line 9: लंक is under खजाना बिभीषन is under `

२४ दोहावली अभागे मनुष्यको भी परम भाग्यवान् बना देता है ॥ ३६ ॥ जल थल नभ गति अमित अति अग जग जीव अनेक । तुलसी तो से दीन कहँ राम नाम गति एक ॥३७॥ भावार्थ—जगत्में चर-अचर अनेक प्रकारके असंख्य जीव हैं और चरोंमें कुछ ऐसे हैं जिनकी जलमें गति है; कुछकी पृथ्वीपर गति है और कुछकी आकाशमें गति है; परंतु हे तुलसीदास ! तुझ-सरीखे दीनके लिये तो रामनाम ही एकमात्र गति है ॥ ३७ ॥ राम भरोसो राम बल राम नाम बिस्वास । सुमिरत सुभ मंगल कुसल माँगत तुलसीदास ॥३८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी यही माँगते हैं कि मेरा एकमात्र रामपर ही भरोसा रहे, रामहीका बल रहे और जिसके स्मरणमात्रहीसे शुभ, मङ्गल और कुशलकी प्राप्ति होती है, उस रामनाममें ही विश्वास रहे ॥ ३८ ॥ राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास । सुमिरत सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास ॥३९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिसका रामनाममें प्रेम है, राम ही जिसकी एकमात्र गति है और रामनाममें ही जिसका विश्वास है, उसके लिये रामनामका स्मरण करनेसे ही दोनों ओर (इस लोकमें और परलोकमें) शुभ, मङ्गल और कुशल है ॥ ३९ ॥ रामप्रेमके बिना सब व्यर्थ है रसना साँपिनि बदन बिल जे न जपहिं हरिनामु । तुलसी प्रेम न राम सों ताहि बिधाता बाम ॥४०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो श्रीहरिका नाम नहीं

जपते, उनकी जीभ सर्पिणीके समान केवल विषय-चर्चारूपी विष उगलनेवाली और मुख उसके बिलके समान है। जिसका राममें प्रेम नहीं है, उसके लिए तो विधाता वाम ही है (अर्थात् उसका भाग्य फूटा ही है) ॥ ४० ॥ हिय फाटहुँ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम । द्रवहिं स्रवहिं पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत राम ॥४१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामका स्मरण करके जो हृदय पिघल नहीं जाते वे हृदय फट जायँ, जिन आंखोंसे प्रेमके आंसू नहीं बहते वे आँखें फूट जायें और जिस शरीरमें रोमाञ्च नहीं होता वह जल जाय, (अर्थात् ऐसे निकम्मे अङ्ग किस कामके ?) ॥४१॥ रामहि सुमिरत रन भिरत देत परत गुरु पायँ । तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु ते जग जीवत जायँ ॥४२॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामका स्मरण होनेके समय, धर्मयुद्धमें शत्रुसे भिड़नेके समय, दान देते समय और श्रीगुरुके चरणोंमें प्रणाम करते समय जिनके शरीरमें विशेष हर्षके कारण रोमाञ्च नहीं होता, वे जगत्में व्यर्थ ही जीते हैं ॥ ४२ ॥ सोरठा हृदय सो कुलिस समान जो न द्रवइ हरिगुन सुनत । कर न राम गुन गान जीह सो दादुर जीह सम ॥४३॥ भावार्थ—श्रीहरिके गुणोंको सुनकर जो हृदय द्रवित नहीं होता, वह हृदय वज्रके समान कठोर है और जो जीभ श्रीरामका गुणगान नहीं करती, वह जीभ मेढककी जीभके समान व्यर्थ ही टर-टर करनेवाली है ॥ ४३ ॥

२६ दोहावली स्रवै न सलिल सनेहु तुलसी सुनि रघुबीर जस । ते नयना जनि देहु राम ! करहु बरु आँधरो ॥४४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे श्रीरामजी ! मुझको भले ही अंधा बना दीजिये; परंतु ऐसी आंखें मत दीजिये, जिनसे श्रीरघुनाथजीका यश सुनते ही प्रेमके आंसू न बहने लगें ॥ ४४ ॥ रहैं न जल भरि पूरि राम सुजस सुनि रावरो । तिन आँखिनमें धूरि भरि भरि मूठी मेलिये ॥४५॥ भावार्थ—हे श्रीरामजी ! आपका सुयश सुनते ही जो आंखें प्रेमजलसे पूरी तरह भर न जायं उन आंखोंमें तो मुट्ठियाँ भर- भरकर धूल झोंकनी चाहिये ॥ ४५ ॥ प्रार्थना बारक सुमिरत तोहि होहि तिन्हहि सम्मुख सुखद । क्यों न सँभारहि मोहि दया सिंधु दसरथ के ? ॥४६॥ भावार्थ—हे दयासागर दशरथनन्दन ! जो एक बार भी तुम्हारा स्मरण करते हैं, तुम उनके सम्मुख होकर उन्हें सुख देनेवाले बन जाते हो; फिर मेरी सुधि तुम क्यों नहीं लेते ? ॥ ४६ ॥ रामकी और रामप्रेमकी महिमा साहिब होत सरोष सेवक को अपराध सुनि । अपने देखे दोष सपनेहु :राम न उर धरे ॥४७॥ भावार्थ—दूसरे मालिक तो सेवकका अपराध सुनकर ही क्रोधित हो जाते हैं (यह भी जांच नहीं करते कि वास्तवमें उसने कोई अपराध किया है या नहीं), परंतु श्रीरामचन्द्रजीने सेवकके अपराधोंको स्वयं अपनी आँखोंसे देख लेनेपर भी स्वप्नमें भी कभी उनपर

दोहावली २७ ध्यान नहीं दिया [अथवा श्रीरामचन्द्रजीने अपने ही दोषोंको देखा, अपने सेवकके अपराधोंको सपनेमें भी हृदयमें स्थान नहीं दिया] ॥ ४७ ॥ दोहा तुलसी रामहि आपु तें सेवक की रुचि मीठि । सीतापति से साहिबहि कैसे दीजै पीठि ॥४८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीको अपनी रुचिकी अपेक्षा सेवककी रुचि अधिक मधुर लगती है (वे अपनी रुचि छोड़ देते हैं, परंतु सेवककी रुचि रखते हैं), ऐसे श्रीसीतापतिके समान स्वामीसे क्योंकर विमुख हुआ जाय ? ॥ ४८ ॥ तुलसी जाके होयगी अंतर बाहिर दीठि । सो कि कृपालुहि देइगो केवटपालहि पीठि ॥४९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके भीतरी और बाहरी दृष्टि होगी अर्थात् जो लोक-लीला और परम तत्त्व दोनोंको समझता होगा, वह क्या केवटकी रुचिकी रक्षा करनेवाले (चरण पखरवाकर उसे कुलसहित तारनेवाले) कृपालु श्रीरामजीके कभी विमुख होगा ? ॥ ४९ ॥ प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान । तुलसी कहूँ न राम से साहिब सील निधान ॥५०॥ भावार्थ—वानरोंके स्वामी श्रीरामजी तो पेड़ के नीचे विराजते थे और सेवक होनेपर भी वानर पेड़की डालियोंपर बैठते थे, तो भी (इस अशिष्टतापर कोई ध्यान न देकर) प्रभुने उनको अपने ही समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीके समान शीलके भण्डार स्वामी और कहीं भी नहीं हैं ॥ ५० ॥

२८ दोहावली उद्बोधन रे मन सब सों निरस ह्वै सरस राम सों होहि । भलो सिखावन देत है निसि दिन तुलसी तोहि ॥५१॥ भावार्थ—रे मन ! तू संसारके सब पदार्थोंसे प्रीति तोड़कर श्रीरामसे प्रेमकर । तुलसीदास तुझको रात-दिन यही सत् शिक्षा देता हैं ॥ ५१ ॥ हरे चरहिं तापहिं बरे फरें पसारहिं हाथ । तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ ॥५२॥ भावार्थ—वृक्ष जब हरे होते हैं, तब पशु-पक्षी उन्हें चरने लगते हैं, सूख जानेपर लोग उन्हें जलाकर तापते हैं और फलनेपर फल पानेके लिये लोग हाथ पसारने लगते हैं (अर्थात् जहाँ हरा-भरा घर देखते हैं, वहाँ लोग खानेके लिये दौड़े जाते हैं, जहाँ बिगड़ी हालत होती है, वहाँ उसे और भी जलाकर सुखी होते हैं और जहाँ सम्पत्तिसे फला-फूला देखते हैं, वहाँ हाथ पसारकर माँगने लगते हैं)। तुलसीदास- जी कहते हैं कि इस प्रकार जगत्में तो सब स्वार्थके ही मित्र हैं। परमार्थके मित्र तो एकमात्र श्रीरघुनाथजी ही हैं (जो सब समय ही प्रेम करते हैं और दीन स्थितिमें तो विशेष प्रेम करते हैं) ॥ ५२ ॥ स्वारथ सीता राम सों परमारथ सिय राम । तुलसी तेरो दूसरे द्वार कहा कहु काम ॥५३॥ भावार्थ—श्रीसीतारामसे ही तेरे सब स्वार्थ सिद्ध हो जायेंगे और श्रीसीताराम ही तेरे परमार्थ (परम ध्येय) हैं; तुलसीदासजी कहते हैं कि फिर बतला तेरा दूसरेके दरवाजेपर क्या काम है ? ॥ ५३ ॥

दोहावली २९ स्वारथ परमारथ सकल सुलभ एक ही ओर । द्वार दूसरे दीनता उचित न तुलसी तोर ॥५४॥ भावार्थ—जब एक श्रीरामचन्द्रजीकी ओरसे ही सब स्वार्थ और परमार्थ सुलभ हैं तब हे तुलसी ! तुझे दूसरे के दरवाजेपर दीनता दिखलाना उचित नहीं है ॥ ५४ ॥ तुलसी स्वारथ राम हित परमारथ रघुबीर । सेवक जाके लखन से पवनपूत रनधीर ॥५५॥ भावार्थ—तुलसीदासका तो स्वार्थ भी रामके लिये है और परमार्थ भी वे श्रीरघुनाथजी ही हैं, जिनके श्रीलक्ष्मणजी और रणधीर श्रीहनुमान्‌जी-जैसे सेवक हैं ॥ ५५ ॥ ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि । त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि ॥५६॥ भावार्थ—जैसे जलको छोड़कर सारा जगत् ही मछलीका वैरी है, यहाँतक कि वह आप भी वैरीका काम करती है (जीभके स्वादके लिये काँटेमें अपना मुंह फँसा लेती है), वैसे ही हे तुलसीदास ! एक श्रीरघुनाथजीके बिना अपनी भी यही गति समझ ले (अपना ही मन वैरी बनकर तुझे विषयोंमें फँसा देगा) ॥ ५६ ॥ तुलसीदासजीकी अभिलाषा राम प्रेम बिनु दूबरो राम प्रेमहीं पीन । रघुबर कबहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन ॥५७॥ भावार्थ—जैसे मछली जलके रहनेसे—जलके संयोगसे पुष्ट होती है और जलके बिना दुबली हो जाती है, जलके वियोगमें मर जाती है, वैसे ही हे श्रीरघुनाथजी ! आप इस तुलसीदासको कब ऐसा

३० दोहावली करेंगे जब वह श्रीराम (आप) के प्रेमके बिना मछलीकी भाँति दुबला जाय और श्रीराम (आप) के प्रेमसे ही पुष्ट हो ? ॥५७॥ रामप्रेमकी महत्ता राम सनेही राम गति राम चरन रति जाहि । तुलसी फल जग जनमको दियो बिधाता ताहि ॥५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जो श्रीरामका ही प्रेमी है, श्रीराम ही जिसकी गति हैं और श्रीरामके ही चरणोंमें जिसकी प्रीति है; बस, उसीको विधाताने जगत्में जन्म लेनेका यथार्थ फल दिया है ॥५८॥ आपु आपने तें अधिक जेहि प्रिय सीताराम । तेहि के पगकी पानहीं तुलसी तनु को चाम ॥५९॥ भावार्थ—अपनी और अपने सम्बन्धी समस्त पदार्थोंकी अपेक्षा जिसे श्रीसीतारामजी अधिक प्रिय हैं, तुलसीदासके शरीरका चमड़ा ऐसे प्रेमी भक्तके चरणोंकी जूतियोंमें लगे तो उसका सौभाग्य है ॥५९॥ स्वारथ परमारथ रहित सीता राम सनेहँ । तुलसी सो फल चारि को फल हमार मत एहँ ॥६०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि स्वार्थ (भोग) और परमार्थ (मोक्ष) की इच्छासे रहित जो श्रीसीतारामके प्रति निष्काम और अनन्य प्रेम है, वह अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—चारों फलोंका भी महान् फल है—यह मेरा मत है ॥६०॥ जे जन रूखे बिषय रस चिकने राम सनेहँ । तुलसी ते प्रिय रामको कानन बसहिं कि गेहँ ॥६१॥

दोहावली ३१ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो विषय-रससे विरक्त हैं और रामप्रेमके रसिक हैं, वे ही श्रीरामजीके प्यारे हैं—फिर चाहे वे वनमें रहें या घरमें (विरक्त हों या गृहस्थ) ॥६१॥ जथा लाभ संतोष सुख रघुबर चरन सनेह। तुलसी जो मन खूँद सम कानन बसहुँ कि गेह ॥६२॥ भावार्थ—जो कुछ मिल जाय उसीमें जिनका मन सन्तुष्ट और सुखी रहता है और जिसमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेम भरा है— जिनका मन ऐसा खूँद-सा* बन गया है, तुलसीदासजी कहते हैं कि वे वनमें रहें या घरमें—उनके लिये दोनों एक-से हैं ॥६२॥ तुलसी जौँ पै राम सों नाहिन सहज सनेह। मूँड़ मुड़ायो बादिहीं भाँड़ भयो तजि गेह ॥६३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि श्रीरामचन्द्रजीसे स्वाभाविक प्रेम नहीं है तो फिर वृथा ही मूँड़ मुँड़ाया—साधु हुए और घर छोड़कर भाँड़ बने (वैराग्यका स्वांग भरा) ॥६३॥ रामविमुखताका कुफल तुलसी श्रीरघुबीर तजि करै भरोसो और। सुख संपति की का चली नरकहूँ नाहीं ठौर ॥६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य श्रीरघुनाथजीको छोड़कर दूसरा कोई भरोसा करता है—सुख-सम्पत्तिकी तो बात ही दूर है, उसे नरकमें भी जगह नहीं मिलेगी ॥ ॥६४॥ *घोड़ा पिछले पैर बँधे रहनेके कारण एक ही स्थानपर खड़ा हुआ टाप चलाता रहता है, परंतु स्थान नहीं छोड़ता, उस स्थितिको खूँद कहते हैं। इसी प्रकार सब कुछ करते हुए भी जिनका मन श्रीरामप्रेममें अचल रहता है, उन्हींके सम्बन्धमें यह बात कही गयी है।

१२ दोहावली तुलसी परिहरि हरि हरहि पाँवर पूजहिं भूत । अंत फजीहत होहिँगे गनिका के से पूत ॥६५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरि (भगवान् विष्णु) और श्रीशंकरजीको छोड़कर जो पामर भूतोंकी पूजा करते हैं, वेश्याके पुत्रोंकी तरह उनकी अन्तमें बड़ी दुर्दशा होगी ॥६५॥ सेये सीता राम नहिं भजे न संकर गौरि । जनम गँवायो बादिहीं परत पराई पौरि ॥६६॥ भावार्थ—यदि श्रीसीतारामजीकी सेवा नहीं की और श्रीगौरीशंकरका भजन नहीं किया तो पराये दरवाजेपर पड़े रहकर वृथा ही जन्म गँवाया ॥६६॥ तुलसी हरि अपमान तें होइ अकाज समाज । राज करत रज मिलि गए सदल सकुल कुरुराज ॥६७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरिका अपमान करनेसे हानियोंका समाज जुट जाता है अर्थात् हानि-ही-हानि होती है। [सन्धि करानेके लिये कौरवोंकी राजसभामें दूत बनकर गये हुए] भगवान् श्रीकृष्णका अपमान करनेसे राज्य करते हुए कुरुराज दुर्योधन अपनी सेना और कुटुम्बके सहित धूलमें मिल गये (नष्ट हो गये) ॥ ६७ ॥ तुलसी रामहि परिहरें निपट हानि सुन ओझ । सुरसरि गत सोई सलिल सुरा सरिस गंगोज्झ ॥६८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अरे पण्डित ! सुनो, श्रीरामजीको छोड़ देनेसे अत्यन्त हानि होती है। श्रीगङ्गाजीका वही जल श्रीगङ्गाजीसे अलग हो जानेपर मदिराके समान हो जाता

दोहावली ३३ है* [इसी प्रकार श्रीरामसे विमुख होकर विषयोंका सङ्ग करनेसे परमात्माका अंश जीव अपवित्र होकर नरकगामी हो जाता है] ॥६८॥ राम दूरि माया बढ़ति घटति जानि मन माँह। भूरि होति रबि दूरि लखि सिर पर पगतल छाँह ॥६९॥ भावार्थ—जैसे सूर्यको दूर देखकर छाया लम्बी हो जाती है और सूर्य जब सिरपर आ जाता है तब वह ठीक पैरोंके नीचे आ जाती है, उसी प्रकार श्रीरामजीसे दूर रहनेपर माया बढ़ती है और जब वह श्रीरामजीको मनमें विराजित जानती है, तब घट जाती है॥६९॥ साहिब सीतानाथ सों जब घटिहै अनुराग। तुलसी तबहीं भालतें झभरि भागिहैं भाग ॥७०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब स्वामी श्रीजानकीनाथजी- से प्रेम घट जायगा, तब उस आदमीके मस्तकसे सौभाग्य तुरंत ही विकल होकर भाग जायगा। (अर्थात् जो मनुष्य भगवान् श्रीरामसे विमुख हो जाता है; उसका सारा सुख-सौभाग्य नष्ट हो जाता है) ॥७०॥ करिहौ कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस। जहाँ तहाँ दुख पाइहौ तबहीं तुलसीदास ॥७१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कोसलपति श्रीरामजीको छोड़कर जबही दूसरी आशा करोगे तभी जहाँ-तहाँ दुःख ही पाओगे ॥७१॥ *शास्त्रका भी वचन है— गङ्गाया निःसृतं तोयं पुनर्गङ्गां न गच्छति। तत्तोयं मदिरातुल्यं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ दोहा० ३–४—

३४ दोहावली बिंधि न ईंधन पाइए सायर जुरै न नीर। परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर ॥७२॥ भावार्थ—यदि श्रीरघुनाथजी प्रतिकूल हो जायँ तो फिर (घनी लकड़ियोंवाले) विन्ध्याचलमें ईंधन नहीं मिलेगा, समुद्रमें जल नहीं जुड़ सकेगा और धनपति कुबेरके घर भी फाका पड़ जायगा ॥७२॥ बरषा को गोबर भयो को चहै को करै प्रीति। तुलसी तू अनुभवहि अब राम बिमुख की रीति ॥७३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तू अब श्रीरामजीसे विमुख मनुष्यकी गतिका तो अनुभव कर; वह बरसातका गोबर हो जाता है [जो न तो लीपनेके काममें आता है न पाथनेके] अर्थात् निकम्मा हो जाता है। उसे कौन चाहेगा? और कौन उससे प्रेम करेगा? ॥७३॥ सबहि समरथहि सुखद प्रिय अच्छम प्रिय हितकारि। कबहुँ न काहुहि राम प्रिय तुलसी कहा बिचारि ॥७४॥ भावार्थ—[संसारकी यह दशा है कि] जो समर्थ पुरुष हैं उन सबको तो [सांसारिक] सुख देनेवाला प्रिय लगता है और असमर्थको अपना [सांसारिक] भला करनेवाला प्रिय होता है। तुलसीदासजी विचारकर ऐसा कहते हैं कि भगवान् श्रीराम [विषयी पुरुषोंमें] कभी किसीको भी प्रिय नहीं लगते ॥७४॥ तुलसी उद्यम करम जुग जब जेहि राम सुडीठि। होइ सुफल सोइ ताहि सब सनमुख प्रभु तन पीठि ॥७५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब जिसपर श्रीरामजीकी सुदृष्टि होती है, तब उसके सब उद्यम (क्रियमाण) और कर्म (प्रारब्ध) दोनों सफल हो जाते हैं और वह शरीरकी ममता छोड़कर