भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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२८ दोहावली उद्बोधन रे मन सब सों निरस ह्वै सरस राम सों होहि । भलो सिखावन देत है निसि दिन तुलसी तोहि ॥५१॥ भावार्थ—रे मन ! तू संसारके सब पदार्थोंसे प्रीति तोड़कर श्रीरामसे प्रेमकर । तुलसीदास तुझको रात-दिन यही सत् शिक्षा देता हैं ॥ ५१ ॥ हरे चरहिं तापहिं बरे फरें पसारहिं हाथ । तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ ॥५२॥ भावार्थ—वृक्ष जब हरे होते हैं, तब पशु-पक्षी उन्हें चरने लगते हैं, सूख जानेपर लोग उन्हें जलाकर तापते हैं और फलनेपर फल पानेके लिये लोग हाथ पसारने लगते हैं (अर्थात् जहाँ हरा-भरा घर देखते हैं, वहाँ लोग खानेके लिये दौड़े जाते हैं, जहाँ बिगड़ी हालत होती है, वहाँ उसे और भी जलाकर सुखी होते हैं और जहाँ सम्पत्तिसे फला-फूला देखते हैं, वहाँ हाथ पसारकर माँगने लगते हैं)। तुलसीदास- जी कहते हैं कि इस प्रकार जगत्में तो सब स्वार्थके ही मित्र हैं। परमार्थके मित्र तो एकमात्र श्रीरघुनाथजी ही हैं (जो सब समय ही प्रेम करते हैं और दीन स्थितिमें तो विशेष प्रेम करते हैं) ॥ ५२ ॥ स्वारथ सीता राम सों परमारथ सिय राम । तुलसी तेरो दूसरे द्वार कहा कहु काम ॥५३॥ भावार्थ—श्रीसीतारामसे ही तेरे सब स्वार्थ सिद्ध हो जायेंगे और श्रीसीताराम ही तेरे परमार्थ (परम ध्येय) हैं; तुलसीदासजी कहते हैं कि फिर बतला तेरा दूसरेके दरवाजेपर क्या काम है ? ॥ ५३ ॥