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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली २९ स्वारथ परमारथ सकल सुलभ एक ही ओर । द्वार दूसरे दीनता उचित न तुलसी तोर ॥५४॥ भावार्थ—जब एक श्रीरामचन्द्रजीकी ओरसे ही सब स्वार्थ और परमार्थ सुलभ हैं तब हे तुलसी ! तुझे दूसरे के दरवाजेपर दीनता दिखलाना उचित नहीं है ॥ ५४ ॥ तुलसी स्वारथ राम हित परमारथ रघुबीर । सेवक जाके लखन से पवनपूत रनधीर ॥५५॥ भावार्थ—तुलसीदासका तो स्वार्थ भी रामके लिये है और परमार्थ भी वे श्रीरघुनाथजी ही हैं, जिनके श्रीलक्ष्मणजी और रणधीर श्रीहनुमान्‌जी-जैसे सेवक हैं ॥ ५५ ॥ ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि । त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि ॥५६॥ भावार्थ—जैसे जलको छोड़कर सारा जगत् ही मछलीका वैरी है, यहाँतक कि वह आप भी वैरीका काम करती है (जीभके स्वादके लिये काँटेमें अपना मुंह फँसा लेती है), वैसे ही हे तुलसीदास ! एक श्रीरघुनाथजीके बिना अपनी भी यही गति समझ ले (अपना ही मन वैरी बनकर तुझे विषयोंमें फँसा देगा) ॥ ५६ ॥ तुलसीदासजीकी अभिलाषा राम प्रेम बिनु दूबरो राम प्रेमहीं पीन । रघुबर कबहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन ॥५७॥ भावार्थ—जैसे मछली जलके रहनेसे—जलके संयोगसे पुष्ट होती है और जलके बिना दुबली हो जाती है, जलके वियोगमें मर जाती है, वैसे ही हे श्रीरघुनाथजी ! आप इस तुलसीदासको कब ऐसा