दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० दोहावली करेंगे जब वह श्रीराम (आप) के प्रेमके बिना मछलीकी भाँति दुबला जाय और श्रीराम (आप) के प्रेमसे ही पुष्ट हो ? ॥५७॥ रामप्रेमकी महत्ता राम सनेही राम गति राम चरन रति जाहि । तुलसी फल जग जनमको दियो बिधाता ताहि ॥५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जो श्रीरामका ही प्रेमी है, श्रीराम ही जिसकी गति हैं और श्रीरामके ही चरणोंमें जिसकी प्रीति है; बस, उसीको विधाताने जगत्में जन्म लेनेका यथार्थ फल दिया है ॥५८॥ आपु आपने तें अधिक जेहि प्रिय सीताराम । तेहि के पगकी पानहीं तुलसी तनु को चाम ॥५९॥ भावार्थ—अपनी और अपने सम्बन्धी समस्त पदार्थोंकी अपेक्षा जिसे श्रीसीतारामजी अधिक प्रिय हैं, तुलसीदासके शरीरका चमड़ा ऐसे प्रेमी भक्तके चरणोंकी जूतियोंमें लगे तो उसका सौभाग्य है ॥५९॥ स्वारथ परमारथ रहित सीता राम सनेहँ । तुलसी सो फल चारि को फल हमार मत एहँ ॥६०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि स्वार्थ (भोग) और परमार्थ (मोक्ष) की इच्छासे रहित जो श्रीसीतारामके प्रति निष्काम और अनन्य प्रेम है, वह अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—चारों फलोंका भी महान् फल है—यह मेरा मत है ॥६०॥ जे जन रूखे बिषय रस चिकने राम सनेहँ । तुलसी ते प्रिय रामको कानन बसहिं कि गेहँ ॥६१॥