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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली ३१ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो विषय-रससे विरक्त हैं और रामप्रेमके रसिक हैं, वे ही श्रीरामजीके प्यारे हैं—फिर चाहे वे वनमें रहें या घरमें (विरक्त हों या गृहस्थ) ॥६१॥ जथा लाभ संतोष सुख रघुबर चरन सनेह। तुलसी जो मन खूँद सम कानन बसहुँ कि गेह ॥६२॥ भावार्थ—जो कुछ मिल जाय उसीमें जिनका मन सन्तुष्ट और सुखी रहता है और जिसमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेम भरा है— जिनका मन ऐसा खूँद-सा* बन गया है, तुलसीदासजी कहते हैं कि वे वनमें रहें या घरमें—उनके लिये दोनों एक-से हैं ॥६२॥ तुलसी जौँ पै राम सों नाहिन सहज सनेह। मूँड़ मुड़ायो बादिहीं भाँड़ भयो तजि गेह ॥६३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि श्रीरामचन्द्रजीसे स्वाभाविक प्रेम नहीं है तो फिर वृथा ही मूँड़ मुँड़ाया—साधु हुए और घर छोड़कर भाँड़ बने (वैराग्यका स्वांग भरा) ॥६३॥ रामविमुखताका कुफल तुलसी श्रीरघुबीर तजि करै भरोसो और। सुख संपति की का चली नरकहूँ नाहीं ठौर ॥६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य श्रीरघुनाथजीको छोड़कर दूसरा कोई भरोसा करता है—सुख-सम्पत्तिकी तो बात ही दूर है, उसे नरकमें भी जगह नहीं मिलेगी ॥ ॥६४॥ *घोड़ा पिछले पैर बँधे रहनेके कारण एक ही स्थानपर खड़ा हुआ टाप चलाता रहता है, परंतु स्थान नहीं छोड़ता, उस स्थितिको खूँद कहते हैं। इसी प्रकार सब कुछ करते हुए भी जिनका मन श्रीरामप्रेममें अचल रहता है, उन्हींके सम्बन्धमें यह बात कही गयी है।

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