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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली २७ ध्यान नहीं दिया [अथवा श्रीरामचन्द्रजीने अपने ही दोषोंको देखा, अपने सेवकके अपराधोंको सपनेमें भी हृदयमें स्थान नहीं दिया] ॥ ४७ ॥ दोहा तुलसी रामहि आपु तें सेवक की रुचि मीठि । सीतापति से साहिबहि कैसे दीजै पीठि ॥४८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीको अपनी रुचिकी अपेक्षा सेवककी रुचि अधिक मधुर लगती है (वे अपनी रुचि छोड़ देते हैं, परंतु सेवककी रुचि रखते हैं), ऐसे श्रीसीतापतिके समान स्वामीसे क्योंकर विमुख हुआ जाय ? ॥ ४८ ॥ तुलसी जाके होयगी अंतर बाहिर दीठि । सो कि कृपालुहि देइगो केवटपालहि पीठि ॥४९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके भीतरी और बाहरी दृष्टि होगी अर्थात् जो लोक-लीला और परम तत्त्व दोनोंको समझता होगा, वह क्या केवटकी रुचिकी रक्षा करनेवाले (चरण पखरवाकर उसे कुलसहित तारनेवाले) कृपालु श्रीरामजीके कभी विमुख होगा ? ॥ ४९ ॥ प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान । तुलसी कहूँ न राम से साहिब सील निधान ॥५०॥ भावार्थ—वानरोंके स्वामी श्रीरामजी तो पेड़ के नीचे विराजते थे और सेवक होनेपर भी वानर पेड़की डालियोंपर बैठते थे, तो भी (इस अशिष्टतापर कोई ध्यान न देकर) प्रभुने उनको अपने ही समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीके समान शीलके भण्डार स्वामी और कहीं भी नहीं हैं ॥ ५० ॥