भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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२६ दोहावली स्रवै न सलिल सनेहु तुलसी सुनि रघुबीर जस । ते नयना जनि देहु राम ! करहु बरु आँधरो ॥४४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे श्रीरामजी ! मुझको भले ही अंधा बना दीजिये; परंतु ऐसी आंखें मत दीजिये, जिनसे श्रीरघुनाथजीका यश सुनते ही प्रेमके आंसू न बहने लगें ॥ ४४ ॥ रहैं न जल भरि पूरि राम सुजस सुनि रावरो । तिन आँखिनमें धूरि भरि भरि मूठी मेलिये ॥४५॥ भावार्थ—हे श्रीरामजी ! आपका सुयश सुनते ही जो आंखें प्रेमजलसे पूरी तरह भर न जायं उन आंखोंमें तो मुट्ठियाँ भर- भरकर धूल झोंकनी चाहिये ॥ ४५ ॥ प्रार्थना बारक सुमिरत तोहि होहि तिन्हहि सम्मुख सुखद । क्यों न सँभारहि मोहि दया सिंधु दसरथ के ? ॥४६॥ भावार्थ—हे दयासागर दशरथनन्दन ! जो एक बार भी तुम्हारा स्मरण करते हैं, तुम उनके सम्मुख होकर उन्हें सुख देनेवाले बन जाते हो; फिर मेरी सुधि तुम क्यों नहीं लेते ? ॥ ४६ ॥ रामकी और रामप्रेमकी महिमा साहिब होत सरोष सेवक को अपराध सुनि । अपने देखे दोष सपनेहु :राम न उर धरे ॥४७॥ भावार्थ—दूसरे मालिक तो सेवकका अपराध सुनकर ही क्रोधित हो जाते हैं (यह भी जांच नहीं करते कि वास्तवमें उसने कोई अपराध किया है या नहीं), परंतु श्रीरामचन्द्रजीने सेवकके अपराधोंको स्वयं अपनी आँखोंसे देख लेनेपर भी स्वप्नमें भी कभी उनपर