भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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जपते, उनकी जीभ सर्पिणीके समान केवल विषय-चर्चारूपी विष उगलनेवाली और मुख उसके बिलके समान है। जिसका राममें प्रेम नहीं है, उसके लिए तो विधाता वाम ही है (अर्थात् उसका भाग्य फूटा ही है) ॥ ४० ॥ हिय फाटहुँ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम । द्रवहिं स्रवहिं पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत राम ॥४१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामका स्मरण करके जो हृदय पिघल नहीं जाते वे हृदय फट जायँ, जिन आंखोंसे प्रेमके आंसू नहीं बहते वे आँखें फूट जायें और जिस शरीरमें रोमाञ्च नहीं होता वह जल जाय, (अर्थात् ऐसे निकम्मे अङ्ग किस कामके ?) ॥४१॥ रामहि सुमिरत रन भिरत देत परत गुरु पायँ । तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु ते जग जीवत जायँ ॥४२॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामका स्मरण होनेके समय, धर्मयुद्धमें शत्रुसे भिड़नेके समय, दान देते समय और श्रीगुरुके चरणोंमें प्रणाम करते समय जिनके शरीरमें विशेष हर्षके कारण रोमाञ्च नहीं होता, वे जगत्में व्यर्थ ही जीते हैं ॥ ४२ ॥ सोरठा हृदय सो कुलिस समान जो न द्रवइ हरिगुन सुनत । कर न राम गुन गान जीह सो दादुर जीह सम ॥४३॥ भावार्थ—श्रीहरिके गुणोंको सुनकर जो हृदय द्रवित नहीं होता, वह हृदय वज्रके समान कठोर है और जो जीभ श्रीरामका गुणगान नहीं करती, वह जीभ मेढककी जीभके समान व्यर्थ ही टर-टर करनेवाली है ॥ ४३ ॥