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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

जपते, उनकी जीभ सर्पिणीके समान केवल विषय-चर्चारूपी विष उगलनेवाली और मुख उसके बिलके समान है। जिसका राममें प्रेम नहीं है, उसके लिए तो विधाता वाम ही है (अर्थात् उसका भाग्य फूटा ही है) ॥ ४० ॥ हिय फाटहुँ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम । द्रवहिं स्रवहिं पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत राम ॥४१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामका स्मरण करके जो हृदय पिघल नहीं जाते वे हृदय फट जायँ, जिन आंखोंसे प्रेमके आंसू नहीं बहते वे आँखें फूट जायें और जिस शरीरमें रोमाञ्च नहीं होता वह जल जाय, (अर्थात् ऐसे निकम्मे अङ्ग किस कामके ?) ॥४१॥ रामहि सुमिरत रन भिरत देत परत गुरु पायँ । तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु ते जग जीवत जायँ ॥४२॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामका स्मरण होनेके समय, धर्मयुद्धमें शत्रुसे भिड़नेके समय, दान देते समय और श्रीगुरुके चरणोंमें प्रणाम करते समय जिनके शरीरमें विशेष हर्षके कारण रोमाञ्च नहीं होता, वे जगत्में व्यर्थ ही जीते हैं ॥ ४२ ॥ सोरठा हृदय सो कुलिस समान जो न द्रवइ हरिगुन सुनत । कर न राम गुन गान जीह सो दादुर जीह सम ॥४३॥ भावार्थ—श्रीहरिके गुणोंको सुनकर जो हृदय द्रवित नहीं होता, वह हृदय वज्रके समान कठोर है और जो जीभ श्रीरामका गुणगान नहीं करती, वह जीभ मेढककी जीभके समान व्यर्थ ही टर-टर करनेवाली है ॥ ४३ ॥

२६ दोहावली स्रवै न सलिल सनेहु तुलसी सुनि रघुबीर जस । ते नयना जनि देहु राम ! करहु बरु आँधरो ॥४४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे श्रीरामजी ! मुझको भले ही अंधा बना दीजिये; परंतु ऐसी आंखें मत दीजिये, जिनसे श्रीरघुनाथजीका यश सुनते ही प्रेमके आंसू न बहने लगें ॥ ४४ ॥ रहैं न जल भरि पूरि राम सुजस सुनि रावरो । तिन आँखिनमें धूरि भरि भरि मूठी मेलिये ॥४५॥ भावार्थ—हे श्रीरामजी ! आपका सुयश सुनते ही जो आंखें प्रेमजलसे पूरी तरह भर न जायं उन आंखोंमें तो मुट्ठियाँ भर- भरकर धूल झोंकनी चाहिये ॥ ४५ ॥ प्रार्थना बारक सुमिरत तोहि होहि तिन्हहि सम्मुख सुखद । क्यों न सँभारहि मोहि दया सिंधु दसरथ के ? ॥४६॥ भावार्थ—हे दयासागर दशरथनन्दन ! जो एक बार भी तुम्हारा स्मरण करते हैं, तुम उनके सम्मुख होकर उन्हें सुख देनेवाले बन जाते हो; फिर मेरी सुधि तुम क्यों नहीं लेते ? ॥ ४६ ॥ रामकी और रामप्रेमकी महिमा साहिब होत सरोष सेवक को अपराध सुनि । अपने देखे दोष सपनेहु :राम न उर धरे ॥४७॥ भावार्थ—दूसरे मालिक तो सेवकका अपराध सुनकर ही क्रोधित हो जाते हैं (यह भी जांच नहीं करते कि वास्तवमें उसने कोई अपराध किया है या नहीं), परंतु श्रीरामचन्द्रजीने सेवकके अपराधोंको स्वयं अपनी आँखोंसे देख लेनेपर भी स्वप्नमें भी कभी उनपर

दोहावली २७ ध्यान नहीं दिया [अथवा श्रीरामचन्द्रजीने अपने ही दोषोंको देखा, अपने सेवकके अपराधोंको सपनेमें भी हृदयमें स्थान नहीं दिया] ॥ ४७ ॥ दोहा तुलसी रामहि आपु तें सेवक की रुचि मीठि । सीतापति से साहिबहि कैसे दीजै पीठि ॥४८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीको अपनी रुचिकी अपेक्षा सेवककी रुचि अधिक मधुर लगती है (वे अपनी रुचि छोड़ देते हैं, परंतु सेवककी रुचि रखते हैं), ऐसे श्रीसीतापतिके समान स्वामीसे क्योंकर विमुख हुआ जाय ? ॥ ४८ ॥ तुलसी जाके होयगी अंतर बाहिर दीठि । सो कि कृपालुहि देइगो केवटपालहि पीठि ॥४९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसके भीतरी और बाहरी दृष्टि होगी अर्थात् जो लोक-लीला और परम तत्त्व दोनोंको समझता होगा, वह क्या केवटकी रुचिकी रक्षा करनेवाले (चरण पखरवाकर उसे कुलसहित तारनेवाले) कृपालु श्रीरामजीके कभी विमुख होगा ? ॥ ४९ ॥ प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान । तुलसी कहूँ न राम से साहिब सील निधान ॥५०॥ भावार्थ—वानरोंके स्वामी श्रीरामजी तो पेड़ के नीचे विराजते थे और सेवक होनेपर भी वानर पेड़की डालियोंपर बैठते थे, तो भी (इस अशिष्टतापर कोई ध्यान न देकर) प्रभुने उनको अपने ही समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीके समान शीलके भण्डार स्वामी और कहीं भी नहीं हैं ॥ ५० ॥

२८ दोहावली उद्बोधन रे मन सब सों निरस ह्वै सरस राम सों होहि । भलो सिखावन देत है निसि दिन तुलसी तोहि ॥५१॥ भावार्थ—रे मन ! तू संसारके सब पदार्थोंसे प्रीति तोड़कर श्रीरामसे प्रेमकर । तुलसीदास तुझको रात-दिन यही सत् शिक्षा देता हैं ॥ ५१ ॥ हरे चरहिं तापहिं बरे फरें पसारहिं हाथ । तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ ॥५२॥ भावार्थ—वृक्ष जब हरे होते हैं, तब पशु-पक्षी उन्हें चरने लगते हैं, सूख जानेपर लोग उन्हें जलाकर तापते हैं और फलनेपर फल पानेके लिये लोग हाथ पसारने लगते हैं (अर्थात् जहाँ हरा-भरा घर देखते हैं, वहाँ लोग खानेके लिये दौड़े जाते हैं, जहाँ बिगड़ी हालत होती है, वहाँ उसे और भी जलाकर सुखी होते हैं और जहाँ सम्पत्तिसे फला-फूला देखते हैं, वहाँ हाथ पसारकर माँगने लगते हैं)। तुलसीदास- जी कहते हैं कि इस प्रकार जगत्में तो सब स्वार्थके ही मित्र हैं। परमार्थके मित्र तो एकमात्र श्रीरघुनाथजी ही हैं (जो सब समय ही प्रेम करते हैं और दीन स्थितिमें तो विशेष प्रेम करते हैं) ॥ ५२ ॥ स्वारथ सीता राम सों परमारथ सिय राम । तुलसी तेरो दूसरे द्वार कहा कहु काम ॥५३॥ भावार्थ—श्रीसीतारामसे ही तेरे सब स्वार्थ सिद्ध हो जायेंगे और श्रीसीताराम ही तेरे परमार्थ (परम ध्येय) हैं; तुलसीदासजी कहते हैं कि फिर बतला तेरा दूसरेके दरवाजेपर क्या काम है ? ॥ ५३ ॥

दोहावली २९ स्वारथ परमारथ सकल सुलभ एक ही ओर । द्वार दूसरे दीनता उचित न तुलसी तोर ॥५४॥ भावार्थ—जब एक श्रीरामचन्द्रजीकी ओरसे ही सब स्वार्थ और परमार्थ सुलभ हैं तब हे तुलसी ! तुझे दूसरे के दरवाजेपर दीनता दिखलाना उचित नहीं है ॥ ५४ ॥ तुलसी स्वारथ राम हित परमारथ रघुबीर । सेवक जाके लखन से पवनपूत रनधीर ॥५५॥ भावार्थ—तुलसीदासका तो स्वार्थ भी रामके लिये है और परमार्थ भी वे श्रीरघुनाथजी ही हैं, जिनके श्रीलक्ष्मणजी और रणधीर श्रीहनुमान्‌जी-जैसे सेवक हैं ॥ ५५ ॥ ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि । त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि ॥५६॥ भावार्थ—जैसे जलको छोड़कर सारा जगत् ही मछलीका वैरी है, यहाँतक कि वह आप भी वैरीका काम करती है (जीभके स्वादके लिये काँटेमें अपना मुंह फँसा लेती है), वैसे ही हे तुलसीदास ! एक श्रीरघुनाथजीके बिना अपनी भी यही गति समझ ले (अपना ही मन वैरी बनकर तुझे विषयोंमें फँसा देगा) ॥ ५६ ॥ तुलसीदासजीकी अभिलाषा राम प्रेम बिनु दूबरो राम प्रेमहीं पीन । रघुबर कबहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन ॥५७॥ भावार्थ—जैसे मछली जलके रहनेसे—जलके संयोगसे पुष्ट होती है और जलके बिना दुबली हो जाती है, जलके वियोगमें मर जाती है, वैसे ही हे श्रीरघुनाथजी ! आप इस तुलसीदासको कब ऐसा

३० दोहावली करेंगे जब वह श्रीराम (आप) के प्रेमके बिना मछलीकी भाँति दुबला जाय और श्रीराम (आप) के प्रेमसे ही पुष्ट हो ? ॥५७॥ रामप्रेमकी महत्ता राम सनेही राम गति राम चरन रति जाहि । तुलसी फल जग जनमको दियो बिधाता ताहि ॥५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जो श्रीरामका ही प्रेमी है, श्रीराम ही जिसकी गति हैं और श्रीरामके ही चरणोंमें जिसकी प्रीति है; बस, उसीको विधाताने जगत्में जन्म लेनेका यथार्थ फल दिया है ॥५८॥ आपु आपने तें अधिक जेहि प्रिय सीताराम । तेहि के पगकी पानहीं तुलसी तनु को चाम ॥५९॥ भावार्थ—अपनी और अपने सम्बन्धी समस्त पदार्थोंकी अपेक्षा जिसे श्रीसीतारामजी अधिक प्रिय हैं, तुलसीदासके शरीरका चमड़ा ऐसे प्रेमी भक्तके चरणोंकी जूतियोंमें लगे तो उसका सौभाग्य है ॥५९॥ स्वारथ परमारथ रहित सीता राम सनेहँ । तुलसी सो फल चारि को फल हमार मत एहँ ॥६०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि स्वार्थ (भोग) और परमार्थ (मोक्ष) की इच्छासे रहित जो श्रीसीतारामके प्रति निष्काम और अनन्य प्रेम है, वह अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—चारों फलोंका भी महान् फल है—यह मेरा मत है ॥६०॥ जे जन रूखे बिषय रस चिकने राम सनेहँ । तुलसी ते प्रिय रामको कानन बसहिं कि गेहँ ॥६१॥

दोहावली ३१ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो विषय-रससे विरक्त हैं और रामप्रेमके रसिक हैं, वे ही श्रीरामजीके प्यारे हैं—फिर चाहे वे वनमें रहें या घरमें (विरक्त हों या गृहस्थ) ॥६१॥ जथा लाभ संतोष सुख रघुबर चरन सनेह। तुलसी जो मन खूँद सम कानन बसहुँ कि गेह ॥६२॥ भावार्थ—जो कुछ मिल जाय उसीमें जिनका मन सन्तुष्ट और सुखी रहता है और जिसमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंका प्रेम भरा है— जिनका मन ऐसा खूँद-सा* बन गया है, तुलसीदासजी कहते हैं कि वे वनमें रहें या घरमें—उनके लिये दोनों एक-से हैं ॥६२॥ तुलसी जौँ पै राम सों नाहिन सहज सनेह। मूँड़ मुड़ायो बादिहीं भाँड़ भयो तजि गेह ॥६३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि श्रीरामचन्द्रजीसे स्वाभाविक प्रेम नहीं है तो फिर वृथा ही मूँड़ मुँड़ाया—साधु हुए और घर छोड़कर भाँड़ बने (वैराग्यका स्वांग भरा) ॥६३॥ रामविमुखताका कुफल तुलसी श्रीरघुबीर तजि करै भरोसो और। सुख संपति की का चली नरकहूँ नाहीं ठौर ॥६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य श्रीरघुनाथजीको छोड़कर दूसरा कोई भरोसा करता है—सुख-सम्पत्तिकी तो बात ही दूर है, उसे नरकमें भी जगह नहीं मिलेगी ॥ ॥६४॥ *घोड़ा पिछले पैर बँधे रहनेके कारण एक ही स्थानपर खड़ा हुआ टाप चलाता रहता है, परंतु स्थान नहीं छोड़ता, उस स्थितिको खूँद कहते हैं। इसी प्रकार सब कुछ करते हुए भी जिनका मन श्रीरामप्रेममें अचल रहता है, उन्हींके सम्बन्धमें यह बात कही गयी है।

१२ दोहावली तुलसी परिहरि हरि हरहि पाँवर पूजहिं भूत । अंत फजीहत होहिँगे गनिका के से पूत ॥६५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरि (भगवान् विष्णु) और श्रीशंकरजीको छोड़कर जो पामर भूतोंकी पूजा करते हैं, वेश्याके पुत्रोंकी तरह उनकी अन्तमें बड़ी दुर्दशा होगी ॥६५॥ सेये सीता राम नहिं भजे न संकर गौरि । जनम गँवायो बादिहीं परत पराई पौरि ॥६६॥ भावार्थ—यदि श्रीसीतारामजीकी सेवा नहीं की और श्रीगौरीशंकरका भजन नहीं किया तो पराये दरवाजेपर पड़े रहकर वृथा ही जन्म गँवाया ॥६६॥ तुलसी हरि अपमान तें होइ अकाज समाज । राज करत रज मिलि गए सदल सकुल कुरुराज ॥६७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीहरिका अपमान करनेसे हानियोंका समाज जुट जाता है अर्थात् हानि-ही-हानि होती है। [सन्धि करानेके लिये कौरवोंकी राजसभामें दूत बनकर गये हुए] भगवान् श्रीकृष्णका अपमान करनेसे राज्य करते हुए कुरुराज दुर्योधन अपनी सेना और कुटुम्बके सहित धूलमें मिल गये (नष्ट हो गये) ॥ ६७ ॥ तुलसी रामहि परिहरें निपट हानि सुन ओझ । सुरसरि गत सोई सलिल सुरा सरिस गंगोज्झ ॥६८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि अरे पण्डित ! सुनो, श्रीरामजीको छोड़ देनेसे अत्यन्त हानि होती है। श्रीगङ्गाजीका वही जल श्रीगङ्गाजीसे अलग हो जानेपर मदिराके समान हो जाता

दोहावली ३३ है* [इसी प्रकार श्रीरामसे विमुख होकर विषयोंका सङ्ग करनेसे परमात्माका अंश जीव अपवित्र होकर नरकगामी हो जाता है] ॥६८॥ राम दूरि माया बढ़ति घटति जानि मन माँह। भूरि होति रबि दूरि लखि सिर पर पगतल छाँह ॥६९॥ भावार्थ—जैसे सूर्यको दूर देखकर छाया लम्बी हो जाती है और सूर्य जब सिरपर आ जाता है तब वह ठीक पैरोंके नीचे आ जाती है, उसी प्रकार श्रीरामजीसे दूर रहनेपर माया बढ़ती है और जब वह श्रीरामजीको मनमें विराजित जानती है, तब घट जाती है॥६९॥ साहिब सीतानाथ सों जब घटिहै अनुराग। तुलसी तबहीं भालतें झभरि भागिहैं भाग ॥७०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब स्वामी श्रीजानकीनाथजी- से प्रेम घट जायगा, तब उस आदमीके मस्तकसे सौभाग्य तुरंत ही विकल होकर भाग जायगा। (अर्थात् जो मनुष्य भगवान् श्रीरामसे विमुख हो जाता है; उसका सारा सुख-सौभाग्य नष्ट हो जाता है) ॥७०॥ करिहौ कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस। जहाँ तहाँ दुख पाइहौ तबहीं तुलसीदास ॥७१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कोसलपति श्रीरामजीको छोड़कर जबही दूसरी आशा करोगे तभी जहाँ-तहाँ दुःख ही पाओगे ॥७१॥ *शास्त्रका भी वचन है— गङ्गाया निःसृतं तोयं पुनर्गङ्गां न गच्छति। तत्तोयं मदिरातुल्यं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ दोहा० ३–४—

३४ दोहावली बिंधि न ईंधन पाइए सायर जुरै न नीर। परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर ॥७२॥ भावार्थ—यदि श्रीरघुनाथजी प्रतिकूल हो जायँ तो फिर (घनी लकड़ियोंवाले) विन्ध्याचलमें ईंधन नहीं मिलेगा, समुद्रमें जल नहीं जुड़ सकेगा और धनपति कुबेरके घर भी फाका पड़ जायगा ॥७२॥ बरषा को गोबर भयो को चहै को करै प्रीति। तुलसी तू अनुभवहि अब राम बिमुख की रीति ॥७३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तू अब श्रीरामजीसे विमुख मनुष्यकी गतिका तो अनुभव कर; वह बरसातका गोबर हो जाता है [जो न तो लीपनेके काममें आता है न पाथनेके] अर्थात् निकम्मा हो जाता है। उसे कौन चाहेगा? और कौन उससे प्रेम करेगा? ॥७३॥ सबहि समरथहि सुखद प्रिय अच्छम प्रिय हितकारि। कबहुँ न काहुहि राम प्रिय तुलसी कहा बिचारि ॥७४॥ भावार्थ—[संसारकी यह दशा है कि] जो समर्थ पुरुष हैं उन सबको तो [सांसारिक] सुख देनेवाला प्रिय लगता है और असमर्थको अपना [सांसारिक] भला करनेवाला प्रिय होता है। तुलसीदासजी विचारकर ऐसा कहते हैं कि भगवान् श्रीराम [विषयी पुरुषोंमें] कभी किसीको भी प्रिय नहीं लगते ॥७४॥ तुलसी उद्यम करम जुग जब जेहि राम सुडीठि। होइ सुफल सोइ ताहि सब सनमुख प्रभु तन पीठि ॥७५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब जिसपर श्रीरामजीकी सुदृष्टि होती है, तब उसके सब उद्यम (क्रियमाण) और कर्म (प्रारब्ध) दोनों सफल हो जाते हैं और वह शरीरकी ममता छोड़कर

दोहावली ३५ प्रभुके सम्मुख हो जाता है ॥ ७५ ॥ राम कामतरु परिहरत सेवत कलि तरु ठूँठ । स्वारथ परमारथ चहत सकल मनोरथ झूठ ॥७६॥ भावार्थ—जो मनुष्य श्रीरामरूपी कल्पवृक्षको छोड़कर सूखे ठूंठ- जैसे [निःसार] कलियुग अर्थात् पापरूपी वृक्षका सेवन करते हैं और उससे स्वार्थ और परमार्थरूपी फल चाहते हैं, उनके सभी मनोरथ व्यर्थ होते हैं (अर्थात् स्वार्थ, परमार्थ कुछ भी सिद्ध नहीं होता) ॥ ७६ ॥ कल्याणका सुगम उपाय निज दूषन गुन राम के समुझें तुलसीदास । होइ भलो कलिकालहूँ उभय लोक अनयास ॥७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—अपने दोषों (अपराधों) तथा श्रीरामके [क्षमा, दया आदि] गुणोंको समझ लेनेपर अथवा दोषोंको अपना किया और गुण भगवान् श्रीरामके दिये हुए मान लेनेसे इस कलिकालमें भी मनुष्यका इस लोक और परलोक दोनोंमें सहज ही कल्याण हो जाता है ॥ ७७ ॥ कै तोहि लागहिं राम प्रिय कै तू प्रभु प्रिय होहि । दुइ में रुचै जो सुगम सो कीबे तुलसी तोहि ॥७८॥ भावार्थ—या तो तुझे राम प्रिय लगने लगें या प्रभु श्रीरामका तू प्रिय बन जा । दोनोंमेंसे जो तुझे सुगम जान पड़ तथा प्रिय लगे, तुलसीदासजी कहते हैं कि तुझे वही करना चाहिये । (अर्थात् या तो सबसे प्रेम छोड़कर श्रीरामको ही अपना एकमात्र प्रियतम मान ले या प्रभुकी शरण होकर सब कुछ उन्हें समर्पण कर दे, जिससे वे तुझे अपना अत्यन्त प्रिय मान लें) ॥ ७८ ॥

३६ दोहावली तुलसी दुइ महँ एक ही खेल छाँड़ि छल खेलु। कै करु ममता राम सों कै ममता परहेलु ॥७९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सब छोड़कर तू दोनोंमेंसे एक ही खेल—या तो केवल रामसे ही ममता कर या ममताका सर्वथा त्याग कर दे ॥ ७६ ॥ श्रीरामजीकी प्राप्तिका सुगम उपाय निगम अगम साहेब सुगम राम साँचिली चाह। अंबु असन अवलोकिअत सुलभ सबै जग माँह ॥८०॥ भावार्थ—जो हमारे स्वामी वेदोंके लिये भी अगम हैं, (वेद भी जिनको 'नेति-नेति' कहते हैं) वे ही श्रीराम सच्ची चाहसे ऐसे सुगम हो जाते हैं जैसे जल और अन्न जगत्में सबके लिये सुलभ देखे जाते हैं ॥ ८० ॥ सनमुख आवत पथिक ज्यों दिएँ दाहिनो बाम। तैसोइ होत सु आप को त्यों ही तुलसी राम ॥८१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सामने आते हुए पथिकको आप दायें-बायें जिस ओर देकर चलेंगे उसी प्रकार वह भी आपके दायें-बायें हो जायगा। ऐसे ही श्रीरामको भी जो जिस प्रकार भजता है श्रीराम भी उसे उसी प्रकार भजते हैं* ॥ ८१ ॥ रामप्रेमके लिये वैराग्यकी आवश्यकता राम प्रेम पथ देखिए दिएँ बिषय तन पीठि। तुलसी केंचुरि परिहरें होत साँपहू दीठि ॥८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि विषयोंकी ओर पीठ देनेसे

  • ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११)

दोहावली ३७ ही (विषयोंमें वैराग्य होनेसे ही) श्रीरामजीके प्रेमका पथ दिखलायी पड़ता है। साँपको भी केंचुल छोड़ देनेपर ही दिखलायी देने लगता है ॥ ८२ ॥ तुलसी जौ लौं विषय की मुधा माधुरी मीठि। तौ लौं सुधा सहस सम राम भगति सुठि सीठि ॥८३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जबतक विषयोंकी मिथ्या माधुरी मीठी लगती है, तबतक हजार अमृतके समान मधुर होनेपर भी रामभक्ति बिल्कुल फीकी प्रतीत होती है ॥ ८३ ॥ शरणागतिकी महिमा जैसो तैसो रावरो केवल कोसलपाल। तौ तुलसीको है भलो तिहुँ लोक तिहुँ काल ॥८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे कोसलपति श्रीरामजी ! जैसा-तैसा (भला-बुरा) यह तुलसीदास केवल आपका ही है। यदि यह बात सच है तो तीनों लोकोंमें (यह जहाँ-कहीं रहे) और तीनों कालों (भूत, भविष्य और वर्तमान) में इसका कल्याण-ही-कल्याण है ॥ ८४ ॥ है तुलसी कें एक गुन अवगुन निधि कहैं लोग। भलो भरोसो रावरो राम रीझिबे जोग ॥८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि लोग मुझको अवगुणोंका भण्डार कहते हैं, परंतु मुझमें एक गुण यह है कि मुझको आपका पूरा भरोसा है; इसीसे हे रामजी ! आपको मुझपर रीझ जाना योग्य है ॥ ८५ ॥

३८ दोहावली भक्तिका स्वरूप प्रीति रामसों नीति पथ चलिय राग रिस जीति। तुलसी संतन के मते इहै भगति की रीति॥८६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीसे प्रेम करना और राग (आसक्ति या काम) एवं क्रोधको जीतकर नीतिके मार्ग- पर चलना, संतोंके मतसे भक्तिकी यही रीति है॥ ८६ ॥ कलियुगसे कौन नहीं छला जाता सत्य बचन मानस बिमल कपट रहित करतूति। तुलसी रघुबर सेवकहि सकै न कलिजुग धूति॥८७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिनके वचन सत्य होते हैं, मन निर्मल होता है और क्रिया कपटरहित होती है, ऐसे श्रीरामजीके भक्तोंको कलियुग कभी धोखा नहीं दे सकता (वे मायामें नहीं फँस सकते) ॥ ८७ ॥ तुलसी सुखी जो राम सों दुखी सो निज करतूति। करम बचन मन ठीक जेहि तेहि न सकै कलि धूति॥८८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो मनुष्य श्रीरामजीसे (भगवान् श्रीरामकी कृपासे ही) अपनेको सब प्रकारसे सुखी होना और (श्रीरामजीको छोड़कर) अपनी अहंकार भरी करतूतोंसे दुखी होना मानता है, जिसके कर्म, वचन और मन ठीक हैं (भगवान्में लगे हैं) उसको कलियुग धोखा नहीं दे सकता ॥ ८८ ॥ गोस्वामीजीकी प्रेम-कामना नातो नाते राम कें राम सनेहँ सनेहु। तुलसी मांगत जोरि कर जनम-जनम सिव देहु ॥८६॥

दोहावली ३१ भावार्थ—तुलसीदास हाथ जोड़कर वरदान मांगता है कि हे शिवजी ! मुझे जन्म-जन्मान्तरोंमें यही दीजिये कि मेरा श्रीरामके नाते ही किसीसे नाता हो और श्रीरामसे प्रेमके कारण ही प्रेम हो ॥ ८६ ॥ सब साधनको एक फल जेहिं जान्यो सो जान । ज्यों त्यों मन मंदिर बसहिं राम धरें धनु बान ॥६०॥ भावार्थ—सब साधनोंका यही एकमात्र फल है कि जिस-किसी प्रकारसे भी हो, धनुष-बाण धारण करनेवाले श्रीरामजी मन-मन्दिरमें निवास करने लगें । जिसने इस रहस्यको जान लिया, वही यथार्थ जाननेवाला है ॥ ६० ॥ जौ जगदीस तौ अति भलो जौ महीस तौ भाग । तुलसी चाहत जनम भरि राम चरन अनुराग ॥९१॥ भावार्थ—यदि श्रीरामजी समस्त जगत्के स्वामी हैं तो बहुत ही अच्छी बात है; और यदि वे केवल पृथ्वीके स्वामी—राजा हैं तो भी मेरा बड़ा भाग्य है । [राम कोई भी हों] तुलसीदास तो जन्मभर श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम ही चाहता है ॥ ६१ ॥ परौं नरक फल चारि सिचु मीच डाकिनी खाउ । तुलसी राम सनेह को जो फल सो जरि जाउ ॥९२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, मैं चाहे नरकमें पहूँ, चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) रूपी बालकोंको चाहे मृत्युरूपी डाकिनी खा जाय, श्रीरामजीसे प्रेम करनेका और कुछ भी जो फल हो वह जल जाय [किंतु फिर भी मैं तो श्रीरामके चरणोंमें प्रेम ही करता रहूँगा] ॥ ६२ ॥

४० दोहावली रामभक्तके लक्षण हित सों हित, रति राम सों, रिपु सों बैर बिहाउ । उदासीन सब सों सरल तुलसी सहज सुभाउ ॥९३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रामभक्तका ऐसा सहज भाव होना चाहिये कि श्रीराममें उसका प्रेम हो, मित्रोंसे मैत्री हो, बैरियोंसे बैरका त्याग कर दे, किसीमें पक्षपात न हो और सबसे सरलताका व्यवहार हो ॥ ९३ ॥ तुलसी ममता राम सों समता सब संसार । राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार ॥९४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिनकी श्रीराममें ममता और सब संसारमें समता है, जिनका किसीके प्रति राग, द्वेष, दोष और दुःखका भाव नहीं है, श्रीरामके ऐसे भक्त भवसागरसे पार हो चुके हैं ॥ ९४ ॥ उद्बोधन रामहि डरु करु राम सों ममता प्रीति प्रतीत । तुलसी निरुपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति ॥९५॥ भावार्थ—श्रीरामसे डरो, श्रीराममें ही ममता, प्रेम और विश्वास करो । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामका कपटरहित सेवक हो रहनेपर हारनेमें भी जीत ही है ॥ ९५ ॥ तुलसी राम कृपालु सों कहि सुनाउ गुन दोष । होय दूबरी दीनता परम पीन संतोष ॥९६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तुम कृपालु श्रीरामजीसे अपने सब गुण-दोष दिल खोलकर सुना दो। इससे तुम्हारी दीनता

दोहावली ४१

दुबली (कम) हो जायगी और सन्तोष परम पुष्ट (दृढ़) हो
जायगा ॥ ६६ ॥
सुमिरन सेवा राम सों साहब सों पहिचानि ।
ऐसेहु लाभ न ललक जो तुलसी नित हित हानि ॥९७॥
भावार्थ—श्रीरामजीका स्मरण हो, श्रीरामजीकी सेवाका
सौभाग्य प्राप्त हो और श्रीराम-सरीखे स्वामीको तत्त्वसे पहचान
लिया जाय । ऐसे परम लाभके लिये भी जो नहीं ललचाता,
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके हितकी सर्वथा हानि ही है॥६७॥
जानें जानल जोइए बिनु जाने को जान ।
तुलसी यह सुनि समुझि हियँ आनु धरें धनु बान ॥९८॥
भावार्थ—जाननेपर ही जानना देखा जाता है, बिना जाने कौन
जान सकता है ? (जब हम किसीको जानने लगते हैं, तभी क्रमशः
उसका यथार्थ ज्ञान—साक्षात्कार होता है; जाननेकी चेष्टा ही न
करें तो कैसे जानेंगे !) तुलसीदासजी कहते हैं कि यह बात सुनकर
और समझकर धनुष-बाण धारण किये हुए श्रीरामजीको अपने
हृदयमें ले आओ। (ध्यान करते-करते ही साक्षात्कार हो
जायगा) ॥ ६८ ॥
करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन ।
तुलसी त्रिपथ बिहाइ गो राम दुआरें दीन ॥९९॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कर्मठ (कर्मकाण्डी) लोग
तो मुझे काठकी माला धारण करनेवाला ‘कठमलिया’ कहते हैं,
ज्ञानी मुझको ज्ञानविहीन बतलाते हैं [और उपासना करना मैं
जानता ही नहीं] मैं तो तीनों मार्गोंको छोड़, दीन होकर श्रीराम-
चन्द्रजीके दरवाजेपर जा पड़ा हूँ ॥ ६९ ॥

४२ दोहावली बाधक सब सब के भए साधक भए न कोइ । तुलसी राम कृपालु तें भलो होइ सो होइ ॥१००॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि इस जगत्‌में तो सब लोग सबके बाधक ही होते हैं, साधक कोई किसीका नहीं है ! कृपालु श्रीरामजीसे ही भला होता है सो होता है ॥ १०० ॥ शिव और रामकी एकता संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास । ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥१०१॥ भावार्थ—[भगवान् श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं कि] जिनको शिवजी प्रिय हैं, किंतु जो मुझसे विरोध रखते हैं अथवा जो शिवजीसे विरोध रखते हैं और मेरे दास [बनना चाहते] हैं, वे मनुष्य एक कल्पतक घोर नरकमें पड़े रहते हैं [अतएव श्रीशंकरजीमें और श्रीरामजीमें कोई ऊँच-नीचका भेद नहीं मानना चाहिए।] ॥ १०१ ॥ बिलग बिलग सुख संग दुख जनम मरन सोइ रीति । रहिअत राखे राम कें गए ते उचित अनीति ॥१०२॥ भावार्थ—संसारसे दूर-दूर (आसक्तिरहित होकर) रहनेमें ही सुख है, आसक्तिमें ही दुःख है। यही बात जन्म और मृत्युमें भी है। श्रीरामके रक्खे अर्थात् वे रखना चाहते हैं, इसीलिये (आसक्ति- रहित होकर यहाँ रहना चाहिये। अन्यथा इस अनीतिसे (रागयुक्त संसारसे) जो चले गये, उन्होंने ही उचित किया (तात्पर्य यह है कि जगत्‌में या तो भगवत्प्रेमी होकर रहे या ऐसी चेष्टा करे जिसमें इससे मुक्ति ही मिल जाय) ॥ १०२ ॥

दोहावली ४३ रामप्रेमकी सर्वोत्कृष्टता जायँ कहब करतूति बिनु जायँ जोग बिन छेम । तुलसी जायँ उपाय सब बिना राम पद प्रेम ॥१०३॥ भावार्थ—बिना करनी किये केवल कथनमात्र व्यर्थ है, बिना क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) के योग (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति) व्यर्थ हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामके चरणोंमें प्रेम हुए बिना सब साधन व्यर्थ हैं ॥ १०३ ॥ लोग मगन सब जोगहीं जोग जायँ बिनु छेम । त्यों तुलसी के भावगत राम प्रेम बिनु नेम ॥१०४॥ भावार्थ—लोग सब योगमें ही (अप्राप्त वस्तुके प्राप्त करनेके काममें ही) लगे हैं, परंतु क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) का उपाय किये बिना योग व्यर्थ है। इसी प्रकार तुलसीदासके विचारसे श्रीरामजीके प्रेम बिना सभी नियम व्यर्थ हैं ॥१०४॥ श्रीरामकी कृपा राम निकाई रावरी है सबही को नीक । जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥१०५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामजी ! आपकी भलाई (सुहृद्भाव) से सभीका भला है। अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है। यदि यह बात सत्य है तो तुलसी- दासका भी सदा कल्याण ही है ॥१०५॥ तुलसी राम जो आदरयो खोटो खरो खरोइ । दीपक काजर सिर धरयो धरयो सुघरयो धरोइ ॥१०६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको श्रीरामने आदर दे

४४ दोहावली दिया (अपना लिया) वह बुरा भी भला, सदा भला ही है। दीपकने जब काजलको अपने सिरपर धारण कर लिया तो फिर कर ही लिया ॥ १०६॥ तनु बिचित्र कायर बचन अहि अहार मन घोर । तुलसी हरि भए पच्छधर ताते कह सब मोर ॥१०७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मोरका रंग-बिरंगा विचित्र शरीर है, कायरकी-सी उसकी बोली है, साँप उसका भोजन है और कठोर मन है। इतने अवगुण होनेपर भी भगवान् श्रीकृष्णने उसकी पाँखोंको सिरपर धारण कर लिया—भगवान् उसका पक्ष रखनेवाले हो गये, तो सभी उससे प्रेम करते हुए 'मोर, मोर' (मेरा, मेरा) कहने लगे ॥१०७॥ लहइ न फूटी कौड़िहू को चाहै केहि काज । सो तुलसी महँगो कियो राम गरीबनिवाज ॥१०८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती थी (जिसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी), उसको भला कौन चाहता और किसलिये चाहता। उसी तुलसीको गरीब- निवाज श्रीरामजीने आज महँगा कर दिया (उसका गौरव बढ़ा दिया) ॥१०८॥ घर घर माँगे टूक पुनि भूपति पूजे पाय । जे तुलसी तब राम बिनु ते अब राम सहाय ॥१०९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिस समय मैं रामसे (श्रीरामके आश्रयसे) रहित था, उस समय घर-घर टुकड़े माँगता था। अब जो श्रीरामजी मेरे सहायक हो गये हैं तो फिर राजालोग मेरे पैर पूजते हैं ॥१०९॥