दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ दोहावली तुलसी दुइ महँ एक ही खेल छाँड़ि छल खेलु। कै करु ममता राम सों कै ममता परहेलु ॥७९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सब छोड़कर तू दोनोंमेंसे एक ही खेल—या तो केवल रामसे ही ममता कर या ममताका सर्वथा त्याग कर दे ॥ ७६ ॥ श्रीरामजीकी प्राप्तिका सुगम उपाय निगम अगम साहेब सुगम राम साँचिली चाह। अंबु असन अवलोकिअत सुलभ सबै जग माँह ॥८०॥ भावार्थ—जो हमारे स्वामी वेदोंके लिये भी अगम हैं, (वेद भी जिनको 'नेति-नेति' कहते हैं) वे ही श्रीराम सच्ची चाहसे ऐसे सुगम हो जाते हैं जैसे जल और अन्न जगत्में सबके लिये सुलभ देखे जाते हैं ॥ ८० ॥ सनमुख आवत पथिक ज्यों दिएँ दाहिनो बाम। तैसोइ होत सु आप को त्यों ही तुलसी राम ॥८१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि सामने आते हुए पथिकको आप दायें-बायें जिस ओर देकर चलेंगे उसी प्रकार वह भी आपके दायें-बायें हो जायगा। ऐसे ही श्रीरामको भी जो जिस प्रकार भजता है श्रीराम भी उसे उसी प्रकार भजते हैं* ॥ ८१ ॥ रामप्रेमके लिये वैराग्यकी आवश्यकता राम प्रेम पथ देखिए दिएँ बिषय तन पीठि। तुलसी केंचुरि परिहरें होत साँपहू दीठि ॥८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि विषयोंकी ओर पीठ देनेसे
- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११)