दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 41, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ३७ ही (विषयोंमें वैराग्य होनेसे ही) श्रीरामजीके प्रेमका पथ दिखलायी पड़ता है। साँपको भी केंचुल छोड़ देनेपर ही दिखलायी देने लगता है ॥ ८२ ॥ तुलसी जौ लौं विषय की मुधा माधुरी मीठि। तौ लौं सुधा सहस सम राम भगति सुठि सीठि ॥८३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जबतक विषयोंकी मिथ्या माधुरी मीठी लगती है, तबतक हजार अमृतके समान मधुर होनेपर भी रामभक्ति बिल्कुल फीकी प्रतीत होती है ॥ ८३ ॥ शरणागतिकी महिमा जैसो तैसो रावरो केवल कोसलपाल। तौ तुलसीको है भलो तिहुँ लोक तिहुँ काल ॥८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे कोसलपति श्रीरामजी ! जैसा-तैसा (भला-बुरा) यह तुलसीदास केवल आपका ही है। यदि यह बात सच है तो तीनों लोकोंमें (यह जहाँ-कहीं रहे) और तीनों कालों (भूत, भविष्य और वर्तमान) में इसका कल्याण-ही-कल्याण है ॥ ८४ ॥ है तुलसी कें एक गुन अवगुन निधि कहैं लोग। भलो भरोसो रावरो राम रीझिबे जोग ॥८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि लोग मुझको अवगुणोंका भण्डार कहते हैं, परंतु मुझमें एक गुण यह है कि मुझको आपका पूरा भरोसा है; इसीसे हे रामजी ! आपको मुझपर रीझ जाना योग्य है ॥ ८५ ॥