दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ३५ प्रभुके सम्मुख हो जाता है ॥ ७५ ॥ राम कामतरु परिहरत सेवत कलि तरु ठूँठ । स्वारथ परमारथ चहत सकल मनोरथ झूठ ॥७६॥ भावार्थ—जो मनुष्य श्रीरामरूपी कल्पवृक्षको छोड़कर सूखे ठूंठ- जैसे [निःसार] कलियुग अर्थात् पापरूपी वृक्षका सेवन करते हैं और उससे स्वार्थ और परमार्थरूपी फल चाहते हैं, उनके सभी मनोरथ व्यर्थ होते हैं (अर्थात् स्वार्थ, परमार्थ कुछ भी सिद्ध नहीं होता) ॥ ७६ ॥ कल्याणका सुगम उपाय निज दूषन गुन राम के समुझें तुलसीदास । होइ भलो कलिकालहूँ उभय लोक अनयास ॥७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—अपने दोषों (अपराधों) तथा श्रीरामके [क्षमा, दया आदि] गुणोंको समझ लेनेपर अथवा दोषोंको अपना किया और गुण भगवान् श्रीरामके दिये हुए मान लेनेसे इस कलिकालमें भी मनुष्यका इस लोक और परलोक दोनोंमें सहज ही कल्याण हो जाता है ॥ ७७ ॥ कै तोहि लागहिं राम प्रिय कै तू प्रभु प्रिय होहि । दुइ में रुचै जो सुगम सो कीबे तुलसी तोहि ॥७८॥ भावार्थ—या तो तुझे राम प्रिय लगने लगें या प्रभु श्रीरामका तू प्रिय बन जा । दोनोंमेंसे जो तुझे सुगम जान पड़ तथा प्रिय लगे, तुलसीदासजी कहते हैं कि तुझे वही करना चाहिये । (अर्थात् या तो सबसे प्रेम छोड़कर श्रीरामको ही अपना एकमात्र प्रियतम मान ले या प्रभुकी शरण होकर सब कुछ उन्हें समर्पण कर दे, जिससे वे तुझे अपना अत्यन्त प्रिय मान लें) ॥ ७८ ॥