भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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३४ दोहावली बिंधि न ईंधन पाइए सायर जुरै न नीर। परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीर ॥७२॥ भावार्थ—यदि श्रीरघुनाथजी प्रतिकूल हो जायँ तो फिर (घनी लकड़ियोंवाले) विन्ध्याचलमें ईंधन नहीं मिलेगा, समुद्रमें जल नहीं जुड़ सकेगा और धनपति कुबेरके घर भी फाका पड़ जायगा ॥७२॥ बरषा को गोबर भयो को चहै को करै प्रीति। तुलसी तू अनुभवहि अब राम बिमुख की रीति ॥७३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तू अब श्रीरामजीसे विमुख मनुष्यकी गतिका तो अनुभव कर; वह बरसातका गोबर हो जाता है [जो न तो लीपनेके काममें आता है न पाथनेके] अर्थात् निकम्मा हो जाता है। उसे कौन चाहेगा? और कौन उससे प्रेम करेगा? ॥७३॥ सबहि समरथहि सुखद प्रिय अच्छम प्रिय हितकारि। कबहुँ न काहुहि राम प्रिय तुलसी कहा बिचारि ॥७४॥ भावार्थ—[संसारकी यह दशा है कि] जो समर्थ पुरुष हैं उन सबको तो [सांसारिक] सुख देनेवाला प्रिय लगता है और असमर्थको अपना [सांसारिक] भला करनेवाला प्रिय होता है। तुलसीदासजी विचारकर ऐसा कहते हैं कि भगवान् श्रीराम [विषयी पुरुषोंमें] कभी किसीको भी प्रिय नहीं लगते ॥७४॥ तुलसी उद्यम करम जुग जब जेहि राम सुडीठि। होइ सुफल सोइ ताहि सब सनमुख प्रभु तन पीठि ॥७५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब जिसपर श्रीरामजीकी सुदृष्टि होती है, तब उसके सब उद्यम (क्रियमाण) और कर्म (प्रारब्ध) दोनों सफल हो जाते हैं और वह शरीरकी ममता छोड़कर