दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ३३ है* [इसी प्रकार श्रीरामसे विमुख होकर विषयोंका सङ्ग करनेसे परमात्माका अंश जीव अपवित्र होकर नरकगामी हो जाता है] ॥६८॥ राम दूरि माया बढ़ति घटति जानि मन माँह। भूरि होति रबि दूरि लखि सिर पर पगतल छाँह ॥६९॥ भावार्थ—जैसे सूर्यको दूर देखकर छाया लम्बी हो जाती है और सूर्य जब सिरपर आ जाता है तब वह ठीक पैरोंके नीचे आ जाती है, उसी प्रकार श्रीरामजीसे दूर रहनेपर माया बढ़ती है और जब वह श्रीरामजीको मनमें विराजित जानती है, तब घट जाती है॥६९॥ साहिब सीतानाथ सों जब घटिहै अनुराग। तुलसी तबहीं भालतें झभरि भागिहैं भाग ॥७०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जब स्वामी श्रीजानकीनाथजी- से प्रेम घट जायगा, तब उस आदमीके मस्तकसे सौभाग्य तुरंत ही विकल होकर भाग जायगा। (अर्थात् जो मनुष्य भगवान् श्रीरामसे विमुख हो जाता है; उसका सारा सुख-सौभाग्य नष्ट हो जाता है) ॥७०॥ करिहौ कोसलनाथ तजि जबहिं दूसरी आस। जहाँ तहाँ दुख पाइहौ तबहीं तुलसीदास ॥७१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कोसलपति श्रीरामजीको छोड़कर जबही दूसरी आशा करोगे तभी जहाँ-तहाँ दुःख ही पाओगे ॥७१॥ *शास्त्रका भी वचन है— गङ्गाया निःसृतं तोयं पुनर्गङ्गां न गच्छति। तत्तोयं मदिरातुल्यं पीत्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥ दोहा० ३–४—