दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ३१ भावार्थ—तुलसीदास हाथ जोड़कर वरदान मांगता है कि हे शिवजी ! मुझे जन्म-जन्मान्तरोंमें यही दीजिये कि मेरा श्रीरामके नाते ही किसीसे नाता हो और श्रीरामसे प्रेमके कारण ही प्रेम हो ॥ ८६ ॥ सब साधनको एक फल जेहिं जान्यो सो जान । ज्यों त्यों मन मंदिर बसहिं राम धरें धनु बान ॥६०॥ भावार्थ—सब साधनोंका यही एकमात्र फल है कि जिस-किसी प्रकारसे भी हो, धनुष-बाण धारण करनेवाले श्रीरामजी मन-मन्दिरमें निवास करने लगें । जिसने इस रहस्यको जान लिया, वही यथार्थ जाननेवाला है ॥ ६० ॥ जौ जगदीस तौ अति भलो जौ महीस तौ भाग । तुलसी चाहत जनम भरि राम चरन अनुराग ॥९१॥ भावार्थ—यदि श्रीरामजी समस्त जगत्के स्वामी हैं तो बहुत ही अच्छी बात है; और यदि वे केवल पृथ्वीके स्वामी—राजा हैं तो भी मेरा बड़ा भाग्य है । [राम कोई भी हों] तुलसीदास तो जन्मभर श्रीरामके चरणकमलोंमें प्रेम ही चाहता है ॥ ६१ ॥ परौं नरक फल चारि सिचु मीच डाकिनी खाउ । तुलसी राम सनेह को जो फल सो जरि जाउ ॥९२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, मैं चाहे नरकमें पहूँ, चारों फल (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) रूपी बालकोंको चाहे मृत्युरूपी डाकिनी खा जाय, श्रीरामजीसे प्रेम करनेका और कुछ भी जो फल हो वह जल जाय [किंतु फिर भी मैं तो श्रीरामके चरणोंमें प्रेम ही करता रहूँगा] ॥ ६२ ॥