भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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४० दोहावली रामभक्तके लक्षण हित सों हित, रति राम सों, रिपु सों बैर बिहाउ । उदासीन सब सों सरल तुलसी सहज सुभाउ ॥९३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रामभक्तका ऐसा सहज भाव होना चाहिये कि श्रीराममें उसका प्रेम हो, मित्रोंसे मैत्री हो, बैरियोंसे बैरका त्याग कर दे, किसीमें पक्षपात न हो और सबसे सरलताका व्यवहार हो ॥ ९३ ॥ तुलसी ममता राम सों समता सब संसार । राग न रोष न दोष दुख दास भए भव पार ॥९४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिनकी श्रीराममें ममता और सब संसारमें समता है, जिनका किसीके प्रति राग, द्वेष, दोष और दुःखका भाव नहीं है, श्रीरामके ऐसे भक्त भवसागरसे पार हो चुके हैं ॥ ९४ ॥ उद्बोधन रामहि डरु करु राम सों ममता प्रीति प्रतीत । तुलसी निरुपधि राम को भएँ हारेहूँ जीति ॥९५॥ भावार्थ—श्रीरामसे डरो, श्रीराममें ही ममता, प्रेम और विश्वास करो । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामका कपटरहित सेवक हो रहनेपर हारनेमें भी जीत ही है ॥ ९५ ॥ तुलसी राम कृपालु सों कहि सुनाउ गुन दोष । होय दूबरी दीनता परम पीन संतोष ॥९६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तुम कृपालु श्रीरामजीसे अपने सब गुण-दोष दिल खोलकर सुना दो। इससे तुम्हारी दीनता