भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

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दोहावली ४१

दुबली (कम) हो जायगी और सन्तोष परम पुष्ट (दृढ़) हो
जायगा ॥ ६६ ॥
सुमिरन सेवा राम सों साहब सों पहिचानि ।
ऐसेहु लाभ न ललक जो तुलसी नित हित हानि ॥९७॥
भावार्थ—श्रीरामजीका स्मरण हो, श्रीरामजीकी सेवाका
सौभाग्य प्राप्त हो और श्रीराम-सरीखे स्वामीको तत्त्वसे पहचान
लिया जाय । ऐसे परम लाभके लिये भी जो नहीं ललचाता,
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके हितकी सर्वथा हानि ही है॥६७॥
जानें जानल जोइए बिनु जाने को जान ।
तुलसी यह सुनि समुझि हियँ आनु धरें धनु बान ॥९८॥
भावार्थ—जाननेपर ही जानना देखा जाता है, बिना जाने कौन
जान सकता है ? (जब हम किसीको जानने लगते हैं, तभी क्रमशः
उसका यथार्थ ज्ञान—साक्षात्कार होता है; जाननेकी चेष्टा ही न
करें तो कैसे जानेंगे !) तुलसीदासजी कहते हैं कि यह बात सुनकर
और समझकर धनुष-बाण धारण किये हुए श्रीरामजीको अपने
हृदयमें ले आओ। (ध्यान करते-करते ही साक्षात्कार हो
जायगा) ॥ ६८ ॥
करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन ।
तुलसी त्रिपथ बिहाइ गो राम दुआरें दीन ॥९९॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कर्मठ (कर्मकाण्डी) लोग
तो मुझे काठकी माला धारण करनेवाला ‘कठमलिया’ कहते हैं,
ज्ञानी मुझको ज्ञानविहीन बतलाते हैं [और उपासना करना मैं
जानता ही नहीं] मैं तो तीनों मार्गोंको छोड़, दीन होकर श्रीराम-
चन्द्रजीके दरवाजेपर जा पड़ा हूँ ॥ ६९ ॥