दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
दोहावली ४१
दुबली (कम) हो जायगी और सन्तोष परम पुष्ट (दृढ़) हो
जायगा ॥ ६६ ॥
सुमिरन सेवा राम सों साहब सों पहिचानि ।
ऐसेहु लाभ न ललक जो तुलसी नित हित हानि ॥९७॥
भावार्थ—श्रीरामजीका स्मरण हो, श्रीरामजीकी सेवाका
सौभाग्य प्राप्त हो और श्रीराम-सरीखे स्वामीको तत्त्वसे पहचान
लिया जाय । ऐसे परम लाभके लिये भी जो नहीं ललचाता,
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसके हितकी सर्वथा हानि ही है॥६७॥
जानें जानल जोइए बिनु जाने को जान ।
तुलसी यह सुनि समुझि हियँ आनु धरें धनु बान ॥९८॥
भावार्थ—जाननेपर ही जानना देखा जाता है, बिना जाने कौन
जान सकता है ? (जब हम किसीको जानने लगते हैं, तभी क्रमशः
उसका यथार्थ ज्ञान—साक्षात्कार होता है; जाननेकी चेष्टा ही न
करें तो कैसे जानेंगे !) तुलसीदासजी कहते हैं कि यह बात सुनकर
और समझकर धनुष-बाण धारण किये हुए श्रीरामजीको अपने
हृदयमें ले आओ। (ध्यान करते-करते ही साक्षात्कार हो
जायगा) ॥ ६८ ॥
करमठ कठमलिया कहैं ग्यानी ग्यान बिहीन ।
तुलसी त्रिपथ बिहाइ गो राम दुआरें दीन ॥९९॥
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कर्मठ (कर्मकाण्डी) लोग
तो मुझे काठकी माला धारण करनेवाला ‘कठमलिया’ कहते हैं,
ज्ञानी मुझको ज्ञानविहीन बतलाते हैं [और उपासना करना मैं
जानता ही नहीं] मैं तो तीनों मार्गोंको छोड़, दीन होकर श्रीराम-
चन्द्रजीके दरवाजेपर जा पड़ा हूँ ॥ ६९ ॥
४२ दोहावली बाधक सब सब के भए साधक भए न कोइ । तुलसी राम कृपालु तें भलो होइ सो होइ ॥१००॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि इस जगत्में तो सब लोग सबके बाधक ही होते हैं, साधक कोई किसीका नहीं है ! कृपालु श्रीरामजीसे ही भला होता है सो होता है ॥ १०० ॥ शिव और रामकी एकता संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास । ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥१०१॥ भावार्थ—[भगवान् श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं कि] जिनको शिवजी प्रिय हैं, किंतु जो मुझसे विरोध रखते हैं अथवा जो शिवजीसे विरोध रखते हैं और मेरे दास [बनना चाहते] हैं, वे मनुष्य एक कल्पतक घोर नरकमें पड़े रहते हैं [अतएव श्रीशंकरजीमें और श्रीरामजीमें कोई ऊँच-नीचका भेद नहीं मानना चाहिए।] ॥ १०१ ॥ बिलग बिलग सुख संग दुख जनम मरन सोइ रीति । रहिअत राखे राम कें गए ते उचित अनीति ॥१०२॥ भावार्थ—संसारसे दूर-दूर (आसक्तिरहित होकर) रहनेमें ही सुख है, आसक्तिमें ही दुःख है। यही बात जन्म और मृत्युमें भी है। श्रीरामके रक्खे अर्थात् वे रखना चाहते हैं, इसीलिये (आसक्ति- रहित होकर यहाँ रहना चाहिये। अन्यथा इस अनीतिसे (रागयुक्त संसारसे) जो चले गये, उन्होंने ही उचित किया (तात्पर्य यह है कि जगत्में या तो भगवत्प्रेमी होकर रहे या ऐसी चेष्टा करे जिसमें इससे मुक्ति ही मिल जाय) ॥ १०२ ॥
दोहावली ४३ रामप्रेमकी सर्वोत्कृष्टता जायँ कहब करतूति बिनु जायँ जोग बिन छेम । तुलसी जायँ उपाय सब बिना राम पद प्रेम ॥१०३॥ भावार्थ—बिना करनी किये केवल कथनमात्र व्यर्थ है, बिना क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) के योग (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति) व्यर्थ हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामके चरणोंमें प्रेम हुए बिना सब साधन व्यर्थ हैं ॥ १०३ ॥ लोग मगन सब जोगहीं जोग जायँ बिनु छेम । त्यों तुलसी के भावगत राम प्रेम बिनु नेम ॥१०४॥ भावार्थ—लोग सब योगमें ही (अप्राप्त वस्तुके प्राप्त करनेके काममें ही) लगे हैं, परंतु क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) का उपाय किये बिना योग व्यर्थ है। इसी प्रकार तुलसीदासके विचारसे श्रीरामजीके प्रेम बिना सभी नियम व्यर्थ हैं ॥१०४॥ श्रीरामकी कृपा राम निकाई रावरी है सबही को नीक । जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥१०५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामजी ! आपकी भलाई (सुहृद्भाव) से सभीका भला है। अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है। यदि यह बात सत्य है तो तुलसी- दासका भी सदा कल्याण ही है ॥१०५॥ तुलसी राम जो आदरयो खोटो खरो खरोइ । दीपक काजर सिर धरयो धरयो सुघरयो धरोइ ॥१०६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको श्रीरामने आदर दे
४४ दोहावली दिया (अपना लिया) वह बुरा भी भला, सदा भला ही है। दीपकने जब काजलको अपने सिरपर धारण कर लिया तो फिर कर ही लिया ॥ १०६॥ तनु बिचित्र कायर बचन अहि अहार मन घोर । तुलसी हरि भए पच्छधर ताते कह सब मोर ॥१०७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मोरका रंग-बिरंगा विचित्र शरीर है, कायरकी-सी उसकी बोली है, साँप उसका भोजन है और कठोर मन है। इतने अवगुण होनेपर भी भगवान् श्रीकृष्णने उसकी पाँखोंको सिरपर धारण कर लिया—भगवान् उसका पक्ष रखनेवाले हो गये, तो सभी उससे प्रेम करते हुए 'मोर, मोर' (मेरा, मेरा) कहने लगे ॥१०७॥ लहइ न फूटी कौड़िहू को चाहै केहि काज । सो तुलसी महँगो कियो राम गरीबनिवाज ॥१०८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती थी (जिसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी), उसको भला कौन चाहता और किसलिये चाहता। उसी तुलसीको गरीब- निवाज श्रीरामजीने आज महँगा कर दिया (उसका गौरव बढ़ा दिया) ॥१०८॥ घर घर माँगे टूक पुनि भूपति पूजे पाय । जे तुलसी तब राम बिनु ते अब राम सहाय ॥१०९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिस समय मैं रामसे (श्रीरामके आश्रयसे) रहित था, उस समय घर-घर टुकड़े माँगता था। अब जो श्रीरामजी मेरे सहायक हो गये हैं तो फिर राजालोग मेरे पैर पूजते हैं ॥१०९॥
दोहावली ४५ तुलसी राम सुदीठि तें निबल होत बलवान । बैर बालि सुग्रीव कें कहा कियो हनुमान ॥११०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीकी शुभ दृष्टिसे निर्बल भी बलवान् हो जाते हैं। सुग्रीव और बालिके बैरमें हनुमान्जीने भला क्या किया ? [परंतु वही श्रीरामजीकी कृपासे महान् वीर हो गये] ॥११०॥ तुलसी रामहु तें अधिक राम भगत जियँ जान । रिनिया राजा राम से धनिक भए हनुमान ॥१११॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामके भक्तको रामजीसे भी अधिक समझो। राजराजेश्वर श्रीरामचन्द्रजी स्वयं ऋणी हो गये और उनके भक्त श्रीहनुमान्जी उनके साहूकार बन गये (श्रीराम- जीने यहाँतक कह दिया कि मैं तुम्हारा ऋण कभी चुका ही नहीं सकता) ॥१११॥ कियो सुसेवक धरम कपि प्रभु कृतग्य जियँ जानि । जोरि हाथ ठाढ़े भए बरदायक बरदानि ॥११२॥ भावार्थ—श्रीहनुमान्जीने [अधिक कुछ नहीं किया, केवल] एक अच्छे सेवकका धर्म ही निभाया। परंतु यह जानकर वर देनेवाले देवताओंके भी वरदाता महेश्वर श्रीभगवान् हृदयसे ऐसे कृतज्ञ हुए कि हाथ जोड़कर हनुमान्जीके सामने खड़े हो गये (कहने लगे कि हे हनुमान् ! मैं तुम्हारे बदलेमें उपकार तो क्या करूँ, तुम्हारे सामनै नजर उठाकर देख भी नहीं सकता) ॥११२॥ भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप । किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥११३॥ भावार्थ—जगदीश्वर भगवान् श्रीरामजीने भक्तोंके लिये ही
४६ दोहावली राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंकी भाँति परम पवित्र लीलाएँ कीं ॥११३॥ ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार । सोइ सच्चिदानंदघन कर नर चरित उदार ॥११४॥ भावार्थ—जो ज्ञान (बुद्धि), वाणी और इन्द्रियोंसे परे, अजन्मा तथा माया, मन और गुणोंके पार हैं, वही सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रेष्ठ नरलीला करते हैं ॥११४॥ हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान । जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥११५॥ भावार्थ—जिन कृपासिन्धु भगवान्ने भाई हिरण्यकशिपुसहित हिरण्याक्षको और बलवान् मधु-कैटभको मारा था, वे ही भगवान् [श्रीरामरूपमें] अवतरित हुए हैं ॥११५॥ सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु । चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥११६॥ भावार्थ—शुद्ध (प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंसे रहित, मायातीत दिव्य मङ्गलविग्रह), सच्चिदानन्दकन्दस्वरूप सूर्यकुलके ध्वजारूप भगवान् श्रीरामजी मनुष्योंके समान ऐसे चरित्र करते हैं, जो संसार-सागरसे तारनेके लिये पुलके समान हैं (अर्थात् उन चरित्रोंको गाकर और सुनकर लोग भवसागरसे सहज ही तर जाते हैं) ॥११६॥ भगवान्की बाललीला बाल बिभूषन बसन बर धूरि धूसरित अंग । बालकेलि रघुबर करत बाल बंधु सब संग ॥११७॥ भावार्थ—श्रीरामजी बालोचित सुन्दर गहने-कपड़ोंसे सजे हुए
हैं; उनके श्रीअङ्ग धूलसे मटमैले हो रहे हैं, सब बालकों तथा भाइयोंके साथ आप बालकोंके-से खेल खेल रहे हैं ॥११७॥ अनुदिन अवध बधावने नित नव मंगल मोद । मुदित मातु पितु लोग लखि रघुबर बाल बिनोद ॥११८॥ भावार्थ—श्रीअयोध्याजीमें रोज बधावे बजते हैं, नित नये-नये मङ्गलाचार और आनन्द मनाये जाते हैं। श्रीरघुनाथजीकी बाललीला देख-देखकर माता, पिता तथा सब लोग बड़े प्रसन्न होते हैं ॥११८॥ राज अजिर राजत रुचिर कोसलपालक बाल । जानु पानि चर चरित बर सगुन सुमंगल माल ॥११९॥ भावार्थ—कोसलपति महाराज दशरथके लाड़ले लाल राजमहल- के सुन्दर आँगनमें हाथों और घुटनोंके बल (बकैयाँ) चलते हुए ऐसी उत्तम-उत्तम लीलाएँ कर रहे हैं जो मानो सब शुभ गुण और सुमङ्गलोंकी माला ही है ॥११९॥ नाम ललित लीला ललित ललित रूप रघुनाथ । ललित बसन भूषन ललित ललित अनुज सिसु साथ ॥१२०॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीका नाम, उनकी लीला, उनका सुन्दर रूप, उनके वस्त्र, उनके आभूषण सभी अत्यन्त सुन्दर हैं और सुन्दर छोटे भाई तथा अयोध्यावासी बालक उनके साथ [खेल रहे] हैं ॥१२०॥ राम भरत लछिमन ललित सत्रु समन सुख नाम । सुमिरत दसरथ सुवन सब पूजहिं सब मन काम ॥१२१॥ भावार्थ—श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न ऐसे जिनके सुन्दर और शुभ नाम हैं, दशरथजीके इन सब सुपुत्रोंका स्मरण करते ही सारी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥१२१॥
४८ दोहावली बालक कोसलपाल के सेवकपाल कृपाल। तुलसी मन मानस बसत मंगल मंजु मराल ॥१२२॥ भावार्थ—कोसलपति श्रीदशरथजीके बालक श्रीरामजी सेवकों की रक्षा करनेवाले तथा बड़े ही कृपालु हैं। वे तुलसीदासके मनरूपी मानसरोवरमें कल्याणरूप सुन्दर हंसके समान निवास करते हैं ॥१२२॥ भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जगजाल ॥१२३॥ भावार्थ—भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ, देवताओंके हितके लिये कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य-शरीर धारणकर [नाना प्रकारकी] लीलाएँ करते हैं, जिनके सुननेमात्रसे जगत्के [सारे] जंजाल कट जाते हैं ॥१२३॥ निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥१२४॥ भावार्थ—देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों [की रक्षा] के लिये भगवान् अपनी इच्छासे ही [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार धारण करते हैं। वहाँ सगुण स्वरूपके उपासक भक्तगण [सालोक्य, सामीप्य सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंका परित्याग कर [परिकररूपसे] उनके साथ रहते हैं ॥१२४॥ प्रार्थना परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥१२५॥ भावार्थ—हे परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम, मनकी [सारी]
कामनाओंके पूर्ण करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी ! आप हमें अपनी अविचल प्रेमा भक्ति दीजिये ॥ १२५ ॥ भजनकी महिमा बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल । बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥१२६॥ भावार्थ—जलके मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय तथा बालूके पेरनेसे चाहे तेल निकल आवे; परंतु श्रीहरिके भजन बिना भवसागर- से पार नहीं हुआ जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ॥ १२६ ॥ हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं । भजिअ राम सब काम तजि अस बिचारि मन माहिं ॥१२७॥ भावार्थ—श्रीहरिकी मायाके द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरिके भजन बिना नहीं नष्ट होते । ऐसा मनमें विचारकर सब कामनाओंको त्यागकर श्रीरामजीका भजन ही करना चाहिये ॥ १२७ ॥ जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य । अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य ॥१२८॥ भावार्थ—जो चेतनको जड़ कर देते हैं और जड़को चेतन, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं वे धन्य हैं ॥ १२८ ॥ श्रीरघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान । ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥१२९॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके प्रतापसे समुद्रमें पत्थर तर गये । अतएव वे लोग [निश्चय ही] मन्दबुद्धि हैं जो ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं ॥ १२९ ॥
५० दोहावली लव निमेष परमानु जुग बरस कलप सर चंड । भजसि न मन तेहि राम कहँ कालु जासु कोदंड ॥१३०॥ भावार्थ—हे मन ! तू उन श्रीरामको क्यों नहीं भजता; जिनका काल तो धनुष है और लव, निमेष, परमाणु, युग, वर्ष और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं ॥ १३० ॥ तब लगि कुसल न जीव कहूँ सपनेहुँ मन बिश्राम । जब लगि भजत न राम कहूँ सोकधाम तजि काम॥१३१॥ भावार्थ—जबतक यह जीव शोकके घर काम (विषयोंकी कामना) को त्यागकर श्रीरामजीको नहीं भजता, तबतक उसके लिये न तो कुशल है और न स्वप्नमें भी [कभी] उसके मनको शान्ति मिलती है ॥ १३१ ॥ बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग । मोह गएँ बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग ॥१३२॥ भावार्थ—सत्संगके बिना भगवान्की लीला-कथाएँ सुनने को नहीं मिलतीं, भगवान्की रहस्यमयी कथाओंके सुने बिना मोह नहीं भागता और मोहका नाश हुए बिना भगवान् श्रीरामजीके चरणोंमें सुदृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता ॥ १३२ ॥ बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु । राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥१३३॥ भावार्थ—भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास हुए बिना उनकी भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते नहीं और श्रीरामजीकी कृपा बिना जीव स्वप्नमें विश्राम (शान्ति) नहीं पाता ॥ १३३ ॥
दोहावली ५१ सोरठा अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल । भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥१३४॥ भावार्थ—हे धीरबुद्धि ! ऐसा विचारकर सारे कुतर्कों और संशयोंको त्यागकर करुणाकी खान परम मनोहर दिव्यविग्रह, परम सुखदायक रघुवीर श्रीरामजीका भजन करिये ॥ १३४ ॥ भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन । तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन ॥१३५॥ भावार्थ—सुखके खजाने और करुणाके धाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। अतएव ममता, मद और मानको त्यागकर निरन्तर सीतापति श्रीरामजीका भजन ही करना चाहिये ॥ १३५ ॥ कहहिं बिमलमति संत बेद पुरान बिचारि अस । द्रवहिं जानकी कंत तब छूटै संसार दुख ॥१३६॥ भावार्थ—निर्मल बुद्धिवाले संत वेद और पुराणोंका विचार करके यही कहते हैं कि जानकीनाथ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जब कृपा करते हैं, तभी संसारके दुःखोंसे छुटकारा मिलता है ॥ १३६ ॥ बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु । गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥१३७॥ भावार्थ—वेद-पुराण कहते हैं कि क्या बिना गुरुके ज्ञान हो सकता है, अथवा वैराग्यके बिना क्या ज्ञान प्राप्त हो सकता है ? और श्रीहरिकी भक्ति बिना क्या कभी [सच्चे] सुखकी प्राप्ति हो सकती है ? ॥ १३७ ॥
५२ दोहावली दोहा रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान । ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिखान ॥१३८॥ भावार्थ—जो मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीके भजन बिना ही निर्वाणपद (मोक्ष) चाहता है, वह ज्ञानवान् (समझदार) होनेपर भी बिना सींग-पूँछका (ढूँडा) पशु है ॥ १३८ ॥ जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ । सनमुख होत जो रामपद करइ न सहस सहाइ ॥१३९॥ भावार्थ—वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता-पिता और भाई आदि सब जल जायँ (नष्ट हो जायँ), जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता नहीं करते ॥ १३९ ॥ सेइ साधु गुरु समुझि सिखि राम भगति थिरताइ । लरिकाई को पैरिबो तुलसी बिसरि न जाइ ॥१४०॥ भावार्थ—सच्चे साधु और सद्गुरुकी सेवा करके उनसे श्रीराम- जीके तत्त्वको समझो और सीखो, तब श्रीरामकी भक्ति स्थिर हो जायगी; क्योंकि बचपनमें सीखा हुआ तैरना फिर नहीं भूलता ॥ १४० ॥ रामसेवककी महिमा सबइ कहावत राम के सबहि राम की आस । राम कहहिं जेहि आपनो तेहि भजु तुलसीदास ॥१४१॥ भावार्थ—सभी श्रीरामजीके भक्त कहलाते हैं और सभीको श्रीरामचन्द्रजीकी ही आशा है । परंतु हे तुलसीदास ! तू तो उसीका
दोहावली ५३ भजन (सेवा) कर, जिसको स्वयं श्रीरामचन्द्रजी अपना भक्त कहते हैं ॥१४१॥ जेहि सरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान। रुद्रदेह तजि नेहबस संकर भे हनुमान ॥१४२॥ भावार्थ—चतुरलोग उसी शरीरका आदर करते हैं, जिस शरीर- से श्रीरामजीमें प्रेम होता है। इस प्रेमके कारण ही श्रीशंकरजी अपने रुद्रदेहको त्यागकर हनुमान् बन गये ॥१४२॥ जानि राम सेवा सरस समुझि करब अनुमान। पुरुषा ते सेवक भए हर ते भे हनुमान ॥१४३॥ भावार्थ—श्रीरामजीकी सेवामें परम आनन्द जानकर पितामह ब्रह्माजी सेवक (जाम्बवान्) बन गये और श्रीशिवजी हनुमान् हो गये। इस रहस्यको समझो और प्रेमकी महिमाका अनुमान लगाओ ॥१४३॥ तुलसी रघुबर सेवकहि खल डाटत मन माखि। बाजराज के बालकहि लवा दिखावत आँखि ॥१४४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दुष्ट लोग मनमें क्रोध करके श्रीरघुनाथजीके सेवकको वैसे ही डाँटा करते हैं जैसे बाजराजके बच्चेको बटेर आंख दिखाता है ॥१४४॥ रावन रिपु के दास तें कायर करहिं कुचालि। खर दूषन मारीच ज्यों नीच जाहिंगे कालि ॥१४५॥ भावार्थ—कायर (नीचलोग) ही रावणारि श्रीरामजीके दासोंसे कुचाल किया करते हैं। वे नीच खरदूषण या मारीचकी भाँति कल ही (शीघ्र ही) संसारसे कूच कर जायेंगे ॥१४५॥
५४ दोहावली पुन्य पाप जस अजस के भावी भाजन भूरि । संकट तुलसीदास को राम करहिंगे दूरि ॥१४६॥ भावार्थ—तुलसीदासका संकट तो श्रीरामजी दूर कर ही देंगे। हाँ, सहायक और बाधक लोग भविष्यमें पुण्य-पाप तथा यश-अपयशके पात्र खूब होंगे ॥१४६॥ खेलत बालक ब्याल सँग मेलत पावक हाथ । तुलसी सिसु पितु मातु ज्यों राखत सिय रघुनाथ* ॥१४७॥ भावार्थ—जैसे साँपके साथ खेलते और अग्निमें हाथ डालते हुए बालकको उसके माता-पिता रोक लेते हैं वैसे ही तुलसीदासरूपी शिशुको विषयरूपी विषधर सर्प अथवा विषयरूपी ज्वालाकी ओर जाते देखकर माता-पितारूप श्रीसीतारामजी बचा लेते हैं ॥१४७॥ तुलसी दिन भल साहु कहँ भली चोर कहँ राति । निसि बासर ता कहँ भलो मानै राम इताति ॥१४८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि साहूकारके लिये दिन अच्छा है और चोरके लिये रात अच्छी है; परंतु जो श्रीरामजीकी आज्ञा मानता है, उसके लिये रात-दिन दोनों कल्याणकारी हैं ॥१४८॥ राममहिमा तुलसी जाने सुनि समुझि कृपासिंधु रघुराज । महँगे मनि कंचन किए साँधे जग जल नाज ॥१४९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हमने संत-महात्माओंसे *रामचरितमानसमें इसी भावकी निम्नलिखित अर्द्धाली मिलती है गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई । तहँ राखइ जननी अरगाई ॥ (अरण्य० ४२। ३)
दोहावली ५५
सुनकर और स्वयं समझकर यह भलीभाँति जान लिया है कि श्रीरघुनाथ कृपाके समुद्र हैं, जिन्होंने मणियोंको और सोनेको तो महँगा कर दिया; परंतु प्राण धारण करनेके लिये सबसे अधिक आवश्यक वस्तु जल और अन्नको जगत्में सस्ता (सुलभ) बना दिया ॥१४९॥ रामभजनकी महिमा सेवा सील सनेह बस करि परिहरि प्रिय लोग । तुलसी ते सब राम सों सुखद संजोग बियोग ॥१५०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जगत्के सम्बन्धी प्रियजनों- को (उनके मोहको) त्यागकर सेवा, शील और प्रेमसे श्रीरामजीको वशमें करो। श्रीरामजीके प्रति सेवा, प्रेम आदि करनेपर प्रत्येक संयोग-वियोग सुखप्रद हो जायगा (क्योंकि मोहवश ही मनुष्यको जन्म-मरणशील प्रियजनों या प्रिय पदार्थोंके संयोग-वियोगमें सुख-दुःख होता है और रामजीसे तो कभी वियोग हो ही नहीं सकता ॥१५०॥ चारि चहत मानस अगम चनक चारि को लाहु । चारि परिहरैं चारि को दानि चारि चख चाहु ॥१५१॥ भावार्थ—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारोंको मनुष्य चाहता है; परंतु ये मनसे अगम हैं मिलते नहीं। मिलते हैं चार चने ही (केवल कुछ विषय ही), अतएव इन चारोंकी चाह छोड़कर चारोंके देनेवाले भगवान् श्रीरामजीको बाहरके दो और भीतरके दो (मन- बुद्धि)—इन चारों नेत्रोंसे देखो ॥१५१॥ रामप्रेमकी प्राप्तिका सुगम उपाय सूधे मन सूधे बचन सूधी सब करतूति । तुलसी सूधी सकल बिधि रघुबर प्रेम प्रसूति ॥१५२॥
भावार्थ—जिसका मन सरल है, वाणी सरल है और समस्त क्रियाएँ सरल हैं, उसके लिये भगवान् श्रीरघुनाथजीके प्रेमको उत्पन्न करनेवाली सभी विधियाँ सरल हैं अर्थात् निष्कपट (दम्भरहित) मन, वाणी और कर्मसे भगवान्का प्रेम अत्यन्त सरलतासे प्राप्त हो सकता है ॥१५२॥ रामप्राप्तिमें बाधक बेष बिसद बोलनि मधुर मन कटु करम मलीन। तुलसी राम न पाइऐ भए विषय जल मीन ॥१५३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि ऊपरका वेष साधुओंका- सा हो और बोली भी मीठी हो, परंतु मन कठोर और कर्म भी मलिन हो—इस प्रकार विषयरूपी जलकी मछली बने रहनेसे श्रीराम- जीकी प्राप्ति नहीं होती (श्रीरामजी तो सरल मनवालेको ही मिलते हैं) ॥१५३॥ बचन बेष तें जो बनइ सो बिगरइ परिनाम। तुलसी मन तें जो बनइ बनी बनाई राम ॥१५४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दम्भसे भरे हुए बाहरी वेष और वचनोंसे जो काम बनता है, वह दम्भ खुलनेपर अन्तमें बिगड़ जाता है; परंतु जो काम सरल मनसे बनता है, वह तो श्रीरामकी कृपासे बना-बनाया ही है ॥१५४॥ रामकी अनुकूलतामें ही कल्याण है नीच मीचु लै जाइ जो राम रजायसु पाइ। तौ तुलसी तेरो भलो न तु अनभलो अघाइ ॥१५५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रे नीच ! यदि श्रीरामजीकी
दोहावली ५७ आज्ञा पाकर तुझे मृत्यु ले जाय तो उसमें भी तेरा कल्याण ही है । परंतु मनमाने जीवनमें तो महान् अकल्याण ही है ॥ १५५ ॥ श्रीरामकी शरणागतवत्सलता जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि । महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥१५६॥ भावार्थ—जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्री (शबरी) को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महामूर्ख मन ! तू ऐसे प्रभु श्रीरामको भूलकर सुख चाहता है ? ॥ १५६ ॥ बंधु बधू रत कहि कियो बचन निरुत्तर बालि । तुलसी प्रभु सुग्रीव की चितइ न कछू कुचालि ॥१५७॥ भावार्थ—श्रीरामजीने बालिको तो यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि तू भाईकी स्त्रीपर आसक्त है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुने सुग्रीवकी वैसी ही कुचालपर कुछ भी ध्यान नहीं दिया ॥ १५७ ॥ बालि बली बलसालि दलि सखा कीन्ह कपिराज । तुलसी राम कृपालु को बिरद गरीब निवाज ॥१५८॥ भावार्थ—श्रीरामजीने शरीरसे बली और सेना-राज्यादि बलोंसे युक्त बालिको मारकर सुग्रीवको अपना सखा और बंदरोंका राजा बना दिया । तुलसीदासजी कहते हैं कि कृपालु श्रीरामचन्द्रजीका विरद ही गरीबोंकी रक्षा करना है ॥ १५८ ॥ कहा बिभीषन लै मिल्यो कहा बिगार्यो बालि । तुलसी प्रभु सरनागतहि सब दिन आए पालि ॥१५९॥ भावार्थ—बालिने तो भगवान्का क्या बिगाड़ा था (जिससे उसको मार डाला) और विभीषण ऐसा क्या लेकर आया था
५८ दोहावली (जिससे भगवान्ने उसे लङ्काका राज्य देकर अभय कर दिया) ? तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु सदासे ही अपने शरणागतकी रक्षा करते आये हैं ॥१५९॥ तुलसी कोसलपाल सो को सरनागत पाल । भज्यो बिभीषन बंधु भय भंज्यो दारिद काल ॥१६०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कोसलपति श्रीरामजीके समान शरणागतका पालन करनेवाला और कौन है ? विभीषणने भाई रावणके डरसे श्रीरामजीका भजन किया था, परंतु भगवान्ने उसकी दरिद्रताको तथा कालको नष्ट कर दिया (लङ्काका राज्य देकर अमर कर दिया) ॥ १६० ॥ कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि । चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥१६१॥ भावार्थ—[श्रीकाकभुशुण्डिजी गरुड़जीसे कहते हैं कि] हे पक्षि- राज ! श्रीरामजीका चित्त [अपने लिये तो] वज्रसे अधिक कठोर है और [भक्तोंके लिये] फूलसे भी अधिक कोमल है। कहिये, फिर इस चित्तका रहस्य किसकी समझमें आ सकता है ॥ १६१ ॥ बलकल भूषन फल असन तृन सज्जा द्रुम प्रीति । तिन्ह समयन लंका दई यह रघुबर की रीति ॥१६२॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामजी जिस समय स्वयं वल्कल-वस्त्रोंसे भूषित रहते थे, फल खाते थे, तिनकोंकी शय्यापर सोते थे और वृक्षोंसे प्रेम करते थे, उसी समय उन्होंने विभीषणको लङ्का प्रदान की । श्रीरघुनाथजीकी यही रीति है (स्वयं त्याग करते हैं और भक्तोंको परम ऐश्वर्य दे देते हैं) ॥ १६२ ॥
दोहावली ५९ जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ । सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥१६३॥ भावार्थ—जो सम्पत्ति (लङ्काका राज्य) रावणको शिवजीने दस सिरोंकी बलि चढ़ानेपर दी थी, वही सम्पदा श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बड़े संकोचके साथ दी (यह सोचते रहे कि मैंने इस शरणागत भक्तको तुच्छ वस्तु ही दी) ॥ १६३ ॥ अविचल राज बिभीषनहि दीन्ह राम रघुनाथ । अजहुँ बिराजत लंक पर तुलसी सहित समाज ॥१६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुराज श्रीरामजीने विभीषणको अविचल राज्य दे दिया; इसीसे वह आज भी अपने समाज (परिकर) सहित लङ्काके राज्यपदपर विराजमान है॥१६४॥ कहा बिभीषन लै मिल्यो-कहा दियो रघुनाथ । तुलसी यह जानें बिना मूढ़ मीजिहैं हाथ ॥१६५॥ भावार्थ—विभीषण क्या लेकर भगवान्से मिला था और श्रीरघुनाथजीने उसे क्या दे डाला ? तुलसीदासजी कहते हैं, इस बातको बिना जाने मूर्ख लोग हाथ ही मलते रह जायेंगे (खाली हाथ मिलनेवाले विभीषणको श्रीरामने लङ्काका अचल राज्य और अपनी अविचल भक्ति दे दी । भगवान् श्रीरामके इस स्वभावको न जाननेवाले लोग श्रीरामकी शरण न होकर इस दुःखमय और अनित्य जगत्में ही भटकते रहेंगे) ॥ १६५ ॥ बैरि बंधु निसिचर अधम तज्यो न भरें कलंक । झूठें अघ सिय परिहरी तुलसी साईँ ससंक ॥१६६॥ भावार्थ—शत्रु रावणके भाई, नीच राक्षस और [भाईको त्याग देनेके] कलंकसे भरे रहनेपर भी विभीषणको तो रामने अपनी शरण-
६० दोहावली में ले लिया और झूठे ही अपराधके कारण पवित्रात्मा सीताका त्याग कर दिया। तुलसीदासके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी बड़े ही सावधान हैं (लीला व्यवहारमें अपने अंदर किसी प्रकारका दोष नहीं आने देते) ॥ १६६ ॥ तेहि समाज कियो कठिन पन जेहिं तोल्यो कैलास । तुलसी प्रभु महिमा कहौं सेवक को बिस्वास ॥ १६७॥ भावार्थ—जिस रावणने कैलासको हाथोंसे तौला था, उसीके दरबारमें अङ्गदने पाँव रोपकर कठिन प्रण कर लिया [कि कोई यदि मेरा पैर हटा देगा तो मैं सीता को हार जाऊँगा और श्रीरामजी लौट जायँगे तथा प्रभुने इस प्रणको भङ्ग नहीं होने दिया]। तुलसी- दासजी कहते हैं, इसे मैं प्रभुकी महिमा कहूँ या सेवक (अङ्गद) का विश्वासं बतलाऊँ ॥ १६७ ॥ सभा सभासद निरखि पट पकरि उठायो हाथ । तुलसी कियो इगारहों बसन भेस जदुनाथ ॥ १६८॥ भावार्थ—जिस समय द्रौपदीने सभाकी और सभासदोंकी ओर देखकर (किसीसे भी रक्षाकी आशा न समझकर) एक हाथसे अपनी साड़ीको पकड़ा और दूसरे हाथको ऊँचा करके भगवान्को पुकारा, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसी समय यादवपति भगवान् श्रीकृष्णने ग्यारहवाँ वस्त्रावतार धारण कर लिया (दस अवतार भगवान्के प्रसिद्ध हैं, यह ग्यारहवाँ हुआ) ॥ १६८ ॥ त्राहि तीनि कह्यो द्रौपदी तुलसी राज समाज । प्रथम बढ़े पट बिय विकल चहत चकित निज काज ॥ १६९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि राजसभा में [जब दुःशासन द्रौपदीका चीर खींचने लगा तब] द्रौपदीने घबड़ाकर तीन बार