दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 56, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ दोहावली दोहा रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान । ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिखान ॥१३८॥ भावार्थ—जो मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीके भजन बिना ही निर्वाणपद (मोक्ष) चाहता है, वह ज्ञानवान् (समझदार) होनेपर भी बिना सींग-पूँछका (ढूँडा) पशु है ॥ १३८ ॥ जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ । सनमुख होत जो रामपद करइ न सहस सहाइ ॥१३९॥ भावार्थ—वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता-पिता और भाई आदि सब जल जायँ (नष्ट हो जायँ), जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता नहीं करते ॥ १३९ ॥ सेइ साधु गुरु समुझि सिखि राम भगति थिरताइ । लरिकाई को पैरिबो तुलसी बिसरि न जाइ ॥१४०॥ भावार्थ—सच्चे साधु और सद्गुरुकी सेवा करके उनसे श्रीराम- जीके तत्त्वको समझो और सीखो, तब श्रीरामकी भक्ति स्थिर हो जायगी; क्योंकि बचपनमें सीखा हुआ तैरना फिर नहीं भूलता ॥ १४० ॥ रामसेवककी महिमा सबइ कहावत राम के सबहि राम की आस । राम कहहिं जेहि आपनो तेहि भजु तुलसीदास ॥१४१॥ भावार्थ—सभी श्रीरामजीके भक्त कहलाते हैं और सभीको श्रीरामचन्द्रजीकी ही आशा है । परंतु हे तुलसीदास ! तू तो उसीका