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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 196 में से

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दोहावली ५३ भजन (सेवा) कर, जिसको स्वयं श्रीरामचन्द्रजी अपना भक्त कहते हैं ॥१४१॥ जेहि सरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान। रुद्रदेह तजि नेहबस संकर भे हनुमान ॥१४२॥ भावार्थ—चतुरलोग उसी शरीरका आदर करते हैं, जिस शरीर- से श्रीरामजीमें प्रेम होता है। इस प्रेमके कारण ही श्रीशंकरजी अपने रुद्रदेहको त्यागकर हनुमान् बन गये ॥१४२॥ जानि राम सेवा सरस समुझि करब अनुमान। पुरुषा ते सेवक भए हर ते भे हनुमान ॥१४३॥ भावार्थ—श्रीरामजीकी सेवामें परम आनन्द जानकर पितामह ब्रह्माजी सेवक (जाम्बवान्) बन गये और श्रीशिवजी हनुमान् हो गये। इस रहस्यको समझो और प्रेमकी महिमाका अनुमान लगाओ ॥१४३॥ तुलसी रघुबर सेवकहि खल डाटत मन माखि। बाजराज के बालकहि लवा दिखावत आँखि ॥१४४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दुष्ट लोग मनमें क्रोध करके श्रीरघुनाथजीके सेवकको वैसे ही डाँटा करते हैं जैसे बाजराजके बच्चेको बटेर आंख दिखाता है ॥१४४॥ रावन रिपु के दास तें कायर करहिं कुचालि। खर दूषन मारीच ज्यों नीच जाहिंगे कालि ॥१४५॥ भावार्थ—कायर (नीचलोग) ही रावणारि श्रीरामजीके दासोंसे कुचाल किया करते हैं। वे नीच खरदूषण या मारीचकी भाँति कल ही (शीघ्र ही) संसारसे कूच कर जायेंगे ॥१४५॥

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