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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

५४ दोहावली पुन्य पाप जस अजस के भावी भाजन भूरि । संकट तुलसीदास को राम करहिंगे दूरि ॥१४६॥ भावार्थ—तुलसीदासका संकट तो श्रीरामजी दूर कर ही देंगे। हाँ, सहायक और बाधक लोग भविष्यमें पुण्य-पाप तथा यश-अपयशके पात्र खूब होंगे ॥१४६॥ खेलत बालक ब्याल सँग मेलत पावक हाथ । तुलसी सिसु पितु मातु ज्यों राखत सिय रघुनाथ* ॥१४७॥ भावार्थ—जैसे साँपके साथ खेलते और अग्निमें हाथ डालते हुए बालकको उसके माता-पिता रोक लेते हैं वैसे ही तुलसीदासरूपी शिशुको विषयरूपी विषधर सर्प अथवा विषयरूपी ज्वालाकी ओर जाते देखकर माता-पितारूप श्रीसीतारामजी बचा लेते हैं ॥१४७॥ तुलसी दिन भल साहु कहँ भली चोर कहँ राति । निसि बासर ता कहँ भलो मानै राम इताति ॥१४८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि साहूकारके लिये दिन अच्छा है और चोरके लिये रात अच्छी है; परंतु जो श्रीरामजीकी आज्ञा मानता है, उसके लिये रात-दिन दोनों कल्याणकारी हैं ॥१४८॥ राममहिमा तुलसी जाने सुनि समुझि कृपासिंधु रघुराज । महँगे मनि कंचन किए साँधे जग जल नाज ॥१४९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हमने संत-महात्माओंसे *रामचरितमानसमें इसी भावकी निम्नलिखित अर्द्धाली मिलती है गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई । तहँ राखइ जननी अरगाई ॥ (अरण्य० ४२। ३)

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