दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ५५
सुनकर और स्वयं समझकर यह भलीभाँति जान लिया है कि श्रीरघुनाथ कृपाके समुद्र हैं, जिन्होंने मणियोंको और सोनेको तो महँगा कर दिया; परंतु प्राण धारण करनेके लिये सबसे अधिक आवश्यक वस्तु जल और अन्नको जगत्में सस्ता (सुलभ) बना दिया ॥१४९॥ रामभजनकी महिमा सेवा सील सनेह बस करि परिहरि प्रिय लोग । तुलसी ते सब राम सों सुखद संजोग बियोग ॥१५०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जगत्के सम्बन्धी प्रियजनों- को (उनके मोहको) त्यागकर सेवा, शील और प्रेमसे श्रीरामजीको वशमें करो। श्रीरामजीके प्रति सेवा, प्रेम आदि करनेपर प्रत्येक संयोग-वियोग सुखप्रद हो जायगा (क्योंकि मोहवश ही मनुष्यको जन्म-मरणशील प्रियजनों या प्रिय पदार्थोंके संयोग-वियोगमें सुख-दुःख होता है और रामजीसे तो कभी वियोग हो ही नहीं सकता ॥१५०॥ चारि चहत मानस अगम चनक चारि को लाहु । चारि परिहरैं चारि को दानि चारि चख चाहु ॥१५१॥ भावार्थ—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारोंको मनुष्य चाहता है; परंतु ये मनसे अगम हैं मिलते नहीं। मिलते हैं चार चने ही (केवल कुछ विषय ही), अतएव इन चारोंकी चाह छोड़कर चारोंके देनेवाले भगवान् श्रीरामजीको बाहरके दो और भीतरके दो (मन- बुद्धि)—इन चारों नेत्रोंसे देखो ॥१५१॥ रामप्रेमकी प्राप्तिका सुगम उपाय सूधे मन सूधे बचन सूधी सब करतूति । तुलसी सूधी सकल बिधि रघुबर प्रेम प्रसूति ॥१५२॥