दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभावार्थ—जिसका मन सरल है, वाणी सरल है और समस्त क्रियाएँ सरल हैं, उसके लिये भगवान् श्रीरघुनाथजीके प्रेमको उत्पन्न करनेवाली सभी विधियाँ सरल हैं अर्थात् निष्कपट (दम्भरहित) मन, वाणी और कर्मसे भगवान्का प्रेम अत्यन्त सरलतासे प्राप्त हो सकता है ॥१५२॥ रामप्राप्तिमें बाधक बेष बिसद बोलनि मधुर मन कटु करम मलीन। तुलसी राम न पाइऐ भए विषय जल मीन ॥१५३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि ऊपरका वेष साधुओंका- सा हो और बोली भी मीठी हो, परंतु मन कठोर और कर्म भी मलिन हो—इस प्रकार विषयरूपी जलकी मछली बने रहनेसे श्रीराम- जीकी प्राप्ति नहीं होती (श्रीरामजी तो सरल मनवालेको ही मिलते हैं) ॥१५३॥ बचन बेष तें जो बनइ सो बिगरइ परिनाम। तुलसी मन तें जो बनइ बनी बनाई राम ॥१५४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दम्भसे भरे हुए बाहरी वेष और वचनोंसे जो काम बनता है, वह दम्भ खुलनेपर अन्तमें बिगड़ जाता है; परंतु जो काम सरल मनसे बनता है, वह तो श्रीरामकी कृपासे बना-बनाया ही है ॥१५४॥ रामकी अनुकूलतामें ही कल्याण है नीच मीचु लै जाइ जो राम रजायसु पाइ। तौ तुलसी तेरो भलो न तु अनभलो अघाइ ॥१५५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रे नीच ! यदि श्रीरामजीकी