दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ५७ आज्ञा पाकर तुझे मृत्यु ले जाय तो उसमें भी तेरा कल्याण ही है । परंतु मनमाने जीवनमें तो महान् अकल्याण ही है ॥ १५५ ॥ श्रीरामकी शरणागतवत्सलता जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि । महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि ॥१५६॥ भावार्थ—जो नीच जातिकी और पापोंकी जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्री (शबरी) को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महामूर्ख मन ! तू ऐसे प्रभु श्रीरामको भूलकर सुख चाहता है ? ॥ १५६ ॥ बंधु बधू रत कहि कियो बचन निरुत्तर बालि । तुलसी प्रभु सुग्रीव की चितइ न कछू कुचालि ॥१५७॥ भावार्थ—श्रीरामजीने बालिको तो यह कहकर निरुत्तर कर दिया कि तू भाईकी स्त्रीपर आसक्त है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभुने सुग्रीवकी वैसी ही कुचालपर कुछ भी ध्यान नहीं दिया ॥ १५७ ॥ बालि बली बलसालि दलि सखा कीन्ह कपिराज । तुलसी राम कृपालु को बिरद गरीब निवाज ॥१५८॥ भावार्थ—श्रीरामजीने शरीरसे बली और सेना-राज्यादि बलोंसे युक्त बालिको मारकर सुग्रीवको अपना सखा और बंदरोंका राजा बना दिया । तुलसीदासजी कहते हैं कि कृपालु श्रीरामचन्द्रजीका विरद ही गरीबोंकी रक्षा करना है ॥ १५८ ॥ कहा बिभीषन लै मिल्यो कहा बिगार्यो बालि । तुलसी प्रभु सरनागतहि सब दिन आए पालि ॥१५९॥ भावार्थ—बालिने तो भगवान्का क्या बिगाड़ा था (जिससे उसको मार डाला) और विभीषण ऐसा क्या लेकर आया था