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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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५८ दोहावली (जिससे भगवान्ने उसे लङ्काका राज्य देकर अभय कर दिया) ? तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु सदासे ही अपने शरणागतकी रक्षा करते आये हैं ॥१५९॥ तुलसी कोसलपाल सो को सरनागत पाल । भज्यो बिभीषन बंधु भय भंज्यो दारिद काल ॥१६०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि कोसलपति श्रीरामजीके समान शरणागतका पालन करनेवाला और कौन है ? विभीषणने भाई रावणके डरसे श्रीरामजीका भजन किया था, परंतु भगवान्ने उसकी दरिद्रताको तथा कालको नष्ट कर दिया (लङ्काका राज्य देकर अमर कर दिया) ॥ १६० ॥ कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि । चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥१६१॥ भावार्थ—[श्रीकाकभुशुण्डिजी गरुड़जीसे कहते हैं कि] हे पक्षि- राज ! श्रीरामजीका चित्त [अपने लिये तो] वज्रसे अधिक कठोर है और [भक्तोंके लिये] फूलसे भी अधिक कोमल है। कहिये, फिर इस चित्तका रहस्य किसकी समझमें आ सकता है ॥ १६१ ॥ बलकल भूषन फल असन तृन सज्जा द्रुम प्रीति । तिन्ह समयन लंका दई यह रघुबर की रीति ॥१६२॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामजी जिस समय स्वयं वल्कल-वस्त्रोंसे भूषित रहते थे, फल खाते थे, तिनकोंकी शय्यापर सोते थे और वृक्षोंसे प्रेम करते थे, उसी समय उन्होंने विभीषणको लङ्का प्रदान की । श्रीरघुनाथजीकी यही रीति है (स्वयं त्याग करते हैं और भक्तोंको परम ऐश्वर्य दे देते हैं) ॥ १६२ ॥

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