भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली ५९ जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ । सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥१६३॥ भावार्थ—जो सम्पत्ति (लङ्काका राज्य) रावणको शिवजीने दस सिरोंकी बलि चढ़ानेपर दी थी, वही सम्पदा श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बड़े संकोचके साथ दी (यह सोचते रहे कि मैंने इस शरणागत भक्तको तुच्छ वस्तु ही दी) ॥ १६३ ॥ अविचल राज बिभीषनहि दीन्ह राम रघुनाथ । अजहुँ बिराजत लंक पर तुलसी सहित समाज ॥१६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुराज श्रीरामजीने विभीषणको अविचल राज्य दे दिया; इसीसे वह आज भी अपने समाज (परिकर) सहित लङ्काके राज्यपदपर विराजमान है॥१६४॥ कहा बिभीषन लै मिल्यो-कहा दियो रघुनाथ । तुलसी यह जानें बिना मूढ़ मीजिहैं हाथ ॥१६५॥ भावार्थ—विभीषण क्या लेकर भगवान्‌से मिला था और श्रीरघुनाथजीने उसे क्या दे डाला ? तुलसीदासजी कहते हैं, इस बातको बिना जाने मूर्ख लोग हाथ ही मलते रह जायेंगे (खाली हाथ मिलनेवाले विभीषणको श्रीरामने लङ्काका अचल राज्य और अपनी अविचल भक्ति दे दी । भगवान् श्रीरामके इस स्वभावको न जाननेवाले लोग श्रीरामकी शरण न होकर इस दुःखमय और अनित्य जगत्‌में ही भटकते रहेंगे) ॥ १६५ ॥ बैरि बंधु निसिचर अधम तज्यो न भरें कलंक । झूठें अघ सिय परिहरी तुलसी साईँ ससंक ॥१६६॥ भावार्थ—शत्रु रावणके भाई, नीच राक्षस और [भाईको त्याग देनेके] कलंकसे भरे रहनेपर भी विभीषणको तो रामने अपनी शरण-