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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

दोहावली ५९ जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ । सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥१६३॥ भावार्थ—जो सम्पत्ति (लङ्काका राज्य) रावणको शिवजीने दस सिरोंकी बलि चढ़ानेपर दी थी, वही सम्पदा श्रीरघुनाथजीने विभीषणको बड़े संकोचके साथ दी (यह सोचते रहे कि मैंने इस शरणागत भक्तको तुच्छ वस्तु ही दी) ॥ १६३ ॥ अविचल राज बिभीषनहि दीन्ह राम रघुनाथ । अजहुँ बिराजत लंक पर तुलसी सहित समाज ॥१६४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुराज श्रीरामजीने विभीषणको अविचल राज्य दे दिया; इसीसे वह आज भी अपने समाज (परिकर) सहित लङ्काके राज्यपदपर विराजमान है॥१६४॥ कहा बिभीषन लै मिल्यो-कहा दियो रघुनाथ । तुलसी यह जानें बिना मूढ़ मीजिहैं हाथ ॥१६५॥ भावार्थ—विभीषण क्या लेकर भगवान्‌से मिला था और श्रीरघुनाथजीने उसे क्या दे डाला ? तुलसीदासजी कहते हैं, इस बातको बिना जाने मूर्ख लोग हाथ ही मलते रह जायेंगे (खाली हाथ मिलनेवाले विभीषणको श्रीरामने लङ्काका अचल राज्य और अपनी अविचल भक्ति दे दी । भगवान् श्रीरामके इस स्वभावको न जाननेवाले लोग श्रीरामकी शरण न होकर इस दुःखमय और अनित्य जगत्‌में ही भटकते रहेंगे) ॥ १६५ ॥ बैरि बंधु निसिचर अधम तज्यो न भरें कलंक । झूठें अघ सिय परिहरी तुलसी साईँ ससंक ॥१६६॥ भावार्थ—शत्रु रावणके भाई, नीच राक्षस और [भाईको त्याग देनेके] कलंकसे भरे रहनेपर भी विभीषणको तो रामने अपनी शरण-

६० दोहावली में ले लिया और झूठे ही अपराधके कारण पवित्रात्मा सीताका त्याग कर दिया। तुलसीदासके स्वामी श्रीरामचन्द्रजी बड़े ही सावधान हैं (लीला व्यवहारमें अपने अंदर किसी प्रकारका दोष नहीं आने देते) ॥ १६६ ॥ तेहि समाज कियो कठिन पन जेहिं तोल्यो कैलास । तुलसी प्रभु महिमा कहौं सेवक को बिस्वास ॥ १६७॥ भावार्थ—जिस रावणने कैलासको हाथोंसे तौला था, उसीके दरबारमें अङ्गदने पाँव रोपकर कठिन प्रण कर लिया [कि कोई यदि मेरा पैर हटा देगा तो मैं सीता को हार जाऊँगा और श्रीरामजी लौट जायँगे तथा प्रभुने इस प्रणको भङ्ग नहीं होने दिया]। तुलसी- दासजी कहते हैं, इसे मैं प्रभुकी महिमा कहूँ या सेवक (अङ्गद) का विश्वासं बतलाऊँ ॥ १६७ ॥ सभा सभासद निरखि पट पकरि उठायो हाथ । तुलसी कियो इगारहों बसन भेस जदुनाथ ॥ १६८॥ भावार्थ—जिस समय द्रौपदीने सभाकी और सभासदोंकी ओर देखकर (किसीसे भी रक्षाकी आशा न समझकर) एक हाथसे अपनी साड़ीको पकड़ा और दूसरे हाथको ऊँचा करके भगवान्‌को पुकारा, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसी समय यादवपति भगवान् श्रीकृष्णने ग्यारहवाँ वस्त्रावतार धारण कर लिया (दस अवतार भगवान्‌के प्रसिद्ध हैं, यह ग्यारहवाँ हुआ) ॥ १६८ ॥ त्राहि तीनि कह्यो द्रौपदी तुलसी राज समाज । प्रथम बढ़े पट बिय विकल चहत चकित निज काज ॥ १६९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि राजसभा में [जब दुःशासन द्रौपदीका चीर खींचने लगा तब] द्रौपदीने घबड़ाकर तीन बार

दोहावली ६१ 'त्राहि-त्राहि' पुकारा। पहली त्राहि कहते ही वस्त्र बढ़ गया, दूसरीमें भगवान् व्याकुल हो उठे कि द्रौपदीको सतानेवालोंके लिये अब क्या किया जाय ? [तीसरीमें] चकित होकर अपने (दुष्टसंहाररूपी) कार्यकी इच्छा करने लगे (अर्थात् दुःशासनादि कौरवोंके संहारका निश्चय कर लिया अर्थात् भक्तकी सच्चे मनसे की हुई एक भी पुकार व्यर्थ नहीं जाती ॥१६९॥ सुख जीवन सब कोउ चहत सुख जीवन हरि हाथ। तुलसी दाता मागनेउ देखिअत अबुध अनाथ ॥१७०॥ भावार्थ-सब कोई सुखमय जीवन चाहते हैं, परंतु सुखमय जीवन श्रीहरिके हाथमें है। तुलसीदासको तो जगत्में दाता और भिखारी दोनों ही मूर्ख और अनाथ दिखायी देते हैं (दाता इसलिये मूर्ख हैं कि वे दानके अभिमानसे बँध जाते हैं और भिखारी इसलिये अनाथ हैं कि वे सर्वलोकमहेश्वर, सबके सुहृद्, अकारण कृपालु, भगवान्‌को छोड़कर नाशवान् लोगोंसे नाशवान् भोग माँगते हैं ॥१७०॥ कृपिन देइ पाइअ परो बिनु साधें सिधि होइ । सीतापति सनमुख समुझि जो कीजै सुभ सोइ ॥१७०॥ भावार्थ-कृपण दे देता है, पड़ा मिल जाता है, बिना ही साधनके सिद्धि हो जाती है। श्रीजानकीनाथको सम्मुख समझकर (उनकी कृपापर भरोसा करके) जो कुछ कीजिये, वही शुभ हो जाता है ॥१७१॥ दंडक बन पावन करन चरन सरोज प्रभाउ । ऊसर जामहिं खल तरहिं होइ रंक ते राउ ॥१७२॥ भावार्थ-दण्डकवनको पवित्र (शापमुक्त) करनेवाले भगवान्‌के

६२ दोहावली चरणकमलोंके प्रभावसे ऊसर भूमिमें भी अन्न उत्पन्न हो जाता है, दुष्ट तर जाते हैं और रङ्क (दरिद्री) भी राजा बन जाता है ॥१७२॥ बिनहीं रितु तरुबर फरत सिला द्रबति जल जोर । राम लखन सिय करि कृपा जब चितवत जेहि ओर॥१७३॥ भावार्थ—श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी जब कृपा करके जिसकी तरफ ताक लेते हैं तब बिना ही ऋतुके वृक्ष फलने लगते हैं और पत्थरकी शिलाओंसे बड़े जोरसे जल बहने लगता है ॥१७३॥ सिला सुतिय भइ गिरि तरे मृतक जिए जग जान । राम अनुग्रह सगुन सुभ सुलभ सकल कल्यान ॥१७४॥ भावार्थ—श्रीरामजीकी कृपासे सब शुभ सद्गुण आ जाते हैं, सब प्रकारके कल्याण सुलभ हो जाते हैं (सहज ही मिल जाते हैं)। इस बातको तमाम जगत् जानता है कि श्रीरामकृपासे शिला सुन्दरी स्त्री (अहल्या) बन गयी, समुद्रमें पहाड़ तर गये और युद्धमें मरे हुए वानर-भालु पुनः जीवित हो गये ॥१७४॥ सिला साप मोचन चरन सुमिरहु तुलसीदास । तजहु सोच संकट मिटिहिं पूजहि मन की आस ॥१७५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि शिलाको (अहल्याको) शापसे मुक्त करनेवाले श्रीरामजीके चरणोंका स्मरण करो और सब चिन्ताओंका त्याग कर दो। इस प्रकार अनन्य श्रीरामचिन्तनसे तुम्हारे सब संकट दूर हो जायँगे और मनोकामना पूर्ण हो जायगी ॥१७५॥ मुए जिआए भालु कपि अवध बिप्र को पूत । सुमिरहु तुलसी ताहि तू जाको मारुति दूत ॥१७६॥

दोहावली ६३ भावार्थ—जिन्होंने लङ्कामें मरे हुए बंदर-भालुओंको जिला दिया और अयोध्यामें मरे हुए एक ब्राह्मणके बालकको जीवित कर दिया, हे तुलसीदास ! तुम उनका स्मरण करो जिनके दूत पवनपुत्र हनुमान जी हैं (जो सञ्जीवनी बूटी लाकर लक्ष्मणजीको जीवित करनेवाले हैं) ॥१७६॥ प्रार्थना काल करम गुन दोष जग जीव तिहारे हाथ । तुलसी रघुबर रावरो जानु जानकीनाथ ॥१७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रघुनाथजी ! काल, कर्म, गुण, दोष, जगत्-जीव—सब आपके ही अधीन हैं। हे जानकीनाथ ! इस तुलसीको भी अपना ही जानकर अपनाइये ॥१७७॥ रोग निकर तनु जरठपनु तुलसी संग कुलोग । राम कृपा कै पालिए दीन पालिबे जोग ॥१७८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—मेरा शरीर रोगोंकी खान है, वृद्धावस्था है और बुरे लोगोंका सङ्ग है। हे राम ! आप कृपा करके मुझे अपनाकर मेरा पालन कीजिये, यह दीन पालने योग्य है ॥१७८॥ मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर । अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥१७९॥ भावार्थ—हे रघुवीर ! मेरे समान तो कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनबन्धु नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंश- मणि ! जन्म-मरणके महान् भयका नाश कीजिये ॥१७९॥ भव भुअंग तुलसी नकुल डसत ग्यान हरि लेत । चित्रकूट एक औषधी चितवत होत सचेत ॥१८०॥

६४ दोहावली भावार्थ—संसाररूपी सर्प तुलसीदासरूपी नेवलेको डसते ही उसका सारा ज्ञान हरण कर लेता है; परन्तु चित्रकूट एक ऐसी औषध है कि उसकी ओर देखते ही वह पुनः सचेत हो जाता है (चित्रकूटकी बड़ी महिमा है) ॥१८०॥ हौँहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास । साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास ॥१८१॥ भावार्थ—[तुलसीदासजी कहते हैं कि] सब लोग मुझे श्रीराम- जीका दास कहते हैं और मैं भी बिना लज्जा-संकोचके कहलाता हूँ (कहनेवालोंका विरोध नहीं करता) । कृपालु श्रीरामजी इस उपहास- को सहते हैं कि श्रीजानकीनाथजी-सरीखे स्वामीका तुलसीदास-सा सेवक है ! ॥१८१॥ रामराज्यकी महिमा राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि । राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि ॥१८२॥ भावार्थ—रामराज्यमें सभी नर-नारी अपने-अपने धर्ममें रत होकर शोभित हो रहे हैं। कहीं भी राग (आसक्ति), क्रोध, दोष और दुःख नहीं हैं; धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पदार्थ सुलभ हो रहे हैं ॥१८२॥ राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास । तरु सुरतरु सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास ॥१८३॥ भावार्थ—रामराज्यमें सब प्रकारसे सन्तोष और सुख है, घरमें तथा वनमें दोनों ही जगह सब प्रकारकी सुविधाएँ हैं । वृक्ष कल्प- वृक्षके समान और पृथ्वी कामधेनुके समान इच्छामात्रको पूर्ण करती है और मनोवाञ्छित भोग-विलास सबको प्राप्त हैं ॥१८३॥

दोहावली ६५ खेती बनि बिद्या बनिज सेवा सिलिप सुकाज । तुलसी सुरतरु सरिस सब सुफल राम कें राज ॥१८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीके राज्यमें खेती, मजदूरी, विद्या, व्यापार, सेवा और कारीगरी तथा अन्य सुन्दर कार्य कल्पवृक्षके समान सब सुन्दर शुभ फलोंके देनेवाले हैं ॥१८४॥ दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज । जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥१८५॥ भावार्थ—श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें दण्ड केवल संन्यासियोंके हाथोंमें रह गया था और भेद [सूर-तालके भेदके अर्थमें] केवल नाचनेवालोंके नृत्य-समाजमें था; और 'जीतो' शब्द केवल मनको जीतनेके प्रसङ्गमें ही सुन पड़ता था (राजनीतिमें साम, दान, दण्ड, भेद—ये चार शत्रुको जीतनेके उपाय कहे गये हैं। श्रीरामराज्यमें कोई शत्रु था ही नहीं, जिसके लिये इनसे काम लेना पड़ता; अतएव दण्ड और भेदके नामसे तो क्रमशः उपर्युक्त वस्तु तथा भाव रह गये थे और साम, दान स्वाभाविक सात्त्विक गुण हैं ही) ॥१८५॥ कोपें सोच न पोच कर करिअ निहोर न काज । तुलसी परमिति प्रीति की रीति राम कें राज ॥१८६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें प्रेमकी रीति सीमातक पहुँच गयी थी। इनसे न तो किसीके क्रोध करनेपर कोई उसकी चिन्ता ही करता और न उसका कोई अपकार ही करता। सब लोग सबका काम प्रेमसे करते। काम करनेमें कोई किसीपर अहसान नहीं जताता ॥१८६॥ दोहा० ५-६—,

६६ दोहावली श्रीरामकी दयालुता मुकुर निरखि मुख राम भ्रू गनत गुनहि दै दोष। तुलसी से सठ सेवकन्हि लखि जनि परहिं सरोष॥१८७॥ भावार्थ—श्रीरामजी दर्पणमें अपना श्रीमुख निरखकर अपनी टेढ़ी भौंहोंको जो एक गुण है दोष देते हैं और सोचते हैं कि तुलसी सरीखे दुष्ट सेवकोंको कहीं इन टेढ़ी भृकुटियोंमें क्रोध न दिखायी देने लगे ॥१८७॥ श्रीरामकी धर्मधुरन्धरता सहसनाम मुनि भनित सुनि तुलसी बल्लभ नाम। सकुचित हियँ हँसि निरखि सिय धरम धुरंधर राम॥१८८॥ भावार्थ—मुनिके कहे हुए रामसहस्रनाममें 'तुलसीवल्लभ' अपना नाम सुनकर धर्मधुरंधर भगवान श्रीरामजी हँसकर सीताजीकी ओर देखते हैं और मन-ही-मन सकुचाते हैं ॥१८८॥ श्रीसीताजीका अलौकिक प्रेम गौतम तिय गति सुरति करि नहिँ परसति पग पानि। मन बिहँसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि ॥१८९॥ भावार्थ—[जनकपुरीमें सखियोंके कहनेपर भी] मुनि गौतमकी पत्नी अहल्याकी गतिको याद करके (जो चरणस्पर्श करते ही देवी बनकर आकाशमें उड़ गयी थी) श्रीसीताजी अपने हाथोंसे भगवान् श्रीरामजीके पैर नहीं छूतीं। रघुवंशविभूषण श्रीरामजी सीताजीके इस अलौकिक प्रेमको जानकर मन-ही-मन हँसने लगे ॥१८९॥

२. दोहा १५१-३००: नीति, सत्संगति, कुसंग-त्याग एवं विवेक विचार

दोहावली ६७ श्रीरामकी कीर्ति तुलसी बिलसत नखत निसि सरद सुधाकर साथ । मुकुता झालरि झलक जनु राम सुजसु सिसु हाथ ॥१९०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके साथ रात्रिमें नक्षत्रावली ऐसी शोभा देती है, मानो श्रीरामजीके सुयशरुपी शिशुके हाथमें मोतियोंकी झालर झलमला रही हो ॥ १६० ॥ रघुपति कीरति कामिनी क्यों कहै तुलसीदासु । सरद अकास प्रकास ससि चारु-चिबुक तिल जासु ॥१९१॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीकी कीर्तिरुपी कामिनीका तुलसीदास कैसे बखान कर सकता है ? शरत्पूर्णिमाके आकाशमें प्रकाशित होने- वाला चन्द्रमा मानो उस कीर्ति-कामिनीकी ठुड्डीका तिल है ॥१६१॥ प्रभु गुन गन भूषन बसन बिसद बिसेष सुबेस । राम सुकीरति कामिनी तुलसी करतब केस ॥१९२॥ भावार्थ—प्रभु श्रीरामजीके गुणोंके समूह श्रीरामजीकी सुन्दर कीर्तिरूपी कामिनीके वस्त्र और आभूषण हैं, जिनसे उसका वेष बहुत ही स्वच्छ और सुन्दर जान पड़ता है। और तुलसीदासकी [उस कीर्तिका वर्णन करनारूपी] जो करतूत है, वह [अनधिकार प्रयास होनेके कारण अत्यन्त काली है, इसलिये] उसके केश हैं ॥ १६२ ॥ राम चरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु । सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ॥१९३॥ भावार्थ—श्रीरामचन्द्रजीके चरित्र पूर्णिमाके चन्द्रमाकी किरणोंके समान सभीको सुख देनेवाले हैं, परंतु सज्जनरूपी कुमुद और चकोरोंके चित्तके लिए तो वे विशेषरूपसे हितकारी और महान् लाभरूप हैं ॥ १६३ ॥

६८ दोहावली रघुबर कीरति सज्जननि सीतल खलनि सुताति । ज्यों चकोर चय चक्कवनि तुलसी चाँदनि राति ॥१९४॥ भावार्थ—जिस प्रकार चाँदनी रात चकोरोंके समूहके लिए शान्तिदायिनी और चकवोंके लिये विशेष ताप देनेवाली होती है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसी प्रकार श्रीरघुनाथजीकी कीर्ति सज्जनोंके लिये शीतल [सुख देनेवाली] और दुर्जनोंको विशेष जलानेवाली होती है ॥ १६४ ॥ रामकथाकी महिमा राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु । तुलसी सुभग सुनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥१९५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीकी कथा मन्दा- किनी नदी है, सुन्दर [भक्तिसे पूर्ण निर्दोष] चित्त चित्रकूट है और स्नेह ही सुन्दर वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं ॥ १६५ ॥ स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान । गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥१९६॥ भावार्थ—श्यामा (कजली) गौ काली होनेपर भी उसका दूध बहुत उज्ज्वल और गुणदायक होता है, इसीसे लोग उसे [बड़े चावसे] पीते हैं। इसी प्रकार बुद्धिमान् संतजन [श्रीसीतारामजीके यशको गँवारू भाषामें होनेपर भी [बड़े चावसे] गाते और सुनते हैं ॥१६६॥ हरि हर जस सुर नर गिरहुँ बरनहिं सुकबि समाज । हाँड़ी हाटक घटित चरु रांधें स्वाद सुनाज ॥१९७॥ भावार्थ—सुकविगण भगवान् श्रीहरि और भगवान् श्रीशंकरके

दोहावली ६९ यशको संस्कृत और भाषा दोनोंमें ही वर्णन करते हैं। उत्तम अनाज- को चाहे मिट्टीकी हाँडीमें पकाया जाय, चाहे सोनेके पात्रमें, वह स्वादिष्ट ही होता है ॥ १६७ ॥ राममहिमाकी अज्ञेयता तिल पर राखेउ सकल जग विदित बिलोकत लोग । तुलसी महिमा राम की कौन जानिबे जोग ॥१६८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीकी महिमाको [पूर्णरूपसे] जाननेका अधिकारी कौन है ? (अर्थात् कोई नहीं है।) उन्होंने आँखके काले तिल (पुतली) पर सारे जगत्‌को रख दिया है, इस बातको सब लोग जानते हैं और प्रत्यक्ष देखते हैं (आँखोंका छोटा-सा तिल यदि बिगड़ जाय तो इतना भारी विस्तृत जगत् जरा-सा भी नहीं दीख पड़ता) ॥ १६८ ॥ श्रीरामजीके स्वरूपकी अलौकिकता सोरठा राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर । अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह ॥१६९॥ भावार्थ—हे रामजी ! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर और बुद्धिसे परे है। इस स्वरूपको न कोई जान पाया है, न बखान कर सकता है, न उसका पार ही पा सकता है; इसलिये वेद सदा ‘नेति-नेति’ कहकर उसका वर्णन करते हैं ॥ १६९ ॥ ईश्वर-महिमा दोहा माया जीव सुभाव गुन काल करम महदादि । ईस अंक तें बढ़त सब ईस अंक बिनु बादि ॥२००॥ CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७० दोहावली भावार्थ—माया, जीव, स्वभाव, गुण, काल, कर्म और महत्त्वादि सब ईश्वररूपी अङ्कके संयोगसे बढ़ते हैं और उस अङ्कके बिना व्यर्थ हो जाते हैं ॥ २०० ॥ श्रीरामजीकी भक्तवत्सलता हित उदास रघुबर बिरह बिकल सकल नर नारि। भरत लखन सिय गति समुझि प्रभु दृग सदा सुबारि ॥२०१॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके विरहमें उनके मित्र उदासीन, सभी स्त्री-पुरुष व्याकुल थे; परंतु श्रीभरतजी, श्रीलक्ष्मणजी और श्रीसीता- जीकी दशाको समझकर तो प्रभु श्रीरामजीके नेत्रोंमें भी सदा आँसू भरे रहते थे (अर्थात् समस्त अवधवासी तो श्रीरामजीके कष्टसे दुःखी थे; परंतु स्वयं श्रीरामजी भरतजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके दुःखसे दुःखित रहते थे) ॥ २०१ ॥ सीता, लक्ष्मण और भरतके रामप्रेमकी अलौकिकता सीय सुमित्रा सुवन गति भरत सनेह सुभाउ । कहिबे को सारद सरस जनिबे को रघुराउ ॥२०२॥ भावार्थ—श्रीसीताजी तथा श्रीलक्ष्मणजीकी अनन्य प्रेमकी चाल और श्रीभरतजीके प्रेम और स्वभावको कहनेके लिए केवल सरस्वती- जी ही समर्थ हैं और जाननेके लिये केवल श्रीरघुनाथजी ही ॥२०२॥ जानी राम न कहि सके भरत लखन सिय प्रीति । सो सुनि गुनि तुलसी कहत हठ सठता की रीति ॥२०३॥ भावार्थ—श्रीभरतजी, श्रीलक्ष्मणजी और श्रीसीताजीके प्रेमको श्रीरामचन्द्रजी ही जान सके; पर वे भी उसका वर्णन नहीं कर सके। इस वातको सुनकर और विचारकर भी तुलसीदास हठवश उनके

दोहावली ७१ प्रेमका वर्णन करने चला है, यह उसकी दुष्टता और मूर्खताकी ही निशानी है॥ २०३ ॥ सब बिधि समरथ सकल कह सहि साँसति दिन राति। भलो निबाहेउ सुनि समुझि स्वामिधर्म सब भाँति ॥२०४॥ भावार्थ—प्रेमके तत्त्वको जानने और निवाहनेमें श्रीरामजी ही सब प्रकारसे समर्थ हैं, सब लोग यही कहते हैं। इसीके अनुसार उन्होंने सब कुछ सुन-समझकर दिन-रात कष्ट सहते हुए अपने स्वामि- धर्मको सब प्रकारसे भलीभाँति निबाहा ! (सीताको वन-वन ढूंढ़ते फिरे, लक्ष्मणके लिये कितना विलाप किया और भरतको तो कभी चित्तसे हटाया ही नहीं—भरतकी प्रशंसा स्वयं निम्नलिखित शब्दोंमें की ॥ २०४ ॥ भरत-महिमा भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ। कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥२०५॥ भावार्थ—[अयोध्याके राज्यकी तो बात ही क्या है] ब्रह्मा, विष्णु और महेशका पद पाकर भी भरतको राजमद नहीं हो सकता। काँजीकी बूंदोंसे भला क्या कभी क्षीरसागर नष्ट हो सकता है (फट सकता है) ? ॥ २०५ ॥ संपति चकई भरत चक मुनि आयसु खेलवार। तेहि निसि आश्रम पिँजराँ राखे भा भिनुसार ॥२०६॥ भावार्थ—[भरद्वाजजीके योगबलसे जुटायी हुई] भोग-विलासकी सामग्री मानो चकवी है और भरतजी चकवा हैं तथा भरद्वाज मुनिकी आज्ञा खिलाड़ी है, जिसने उस रातको आश्रमरूपी पिंजड़ेमें CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७२ दोहावली दोनों (चकवी-चकवा) को बंद कर रखा और वैसे ही सवेरा हो गया, परंतु दोनोंका मिलन नहीं हुआ। (श्रीरामजीसे मिलनेके लिये जब भरतजी सब अयोध्यावासियोंको साथ लेकर चित्रकूट जा रहे थे, तब रास्तेमें भरद्वाजजीने उनका आतिथ्यसत्कार किया और तपोबलसे नाना प्रकारकी ऐश्वर्यपूर्ण भोगसामग्रियाँ उत्पन्न कर दीं, परंतु भरतजीने समीप रहनेपर भी उस सम्पत्तिकी ओर— भोग-सामग्रियोंकी ओर मनसे भी नहीं ताका, जैसे चकवा-चकवी रातको एक पिंजरेमें बंद रहनेपर भी एक दूसरेकी ओर नहीं देखते।) ॥ २०६ ॥ सधन चोर मग मुदित मन धनी गही ज्यों फेंट। त्यों सुग्रीव बिभीषनहि भई भरत की भेंट ॥२०७॥ भावार्थ—जैसे धन लेकर प्रसन्न मनसे रास्तेमें जाते हुए चोरको धनी आकर पकड़ ले, उस समय उस चोरकी जैसी हालत होती है, वैसी ही हालत भरतसे मिलनेपर सुग्रीव और विभीषणकी हुई। (सुग्रीव और विभीषणने अपनेको भगवान्का प्रेमी सखा समझ रक्खा था और इस प्रेमरूपी धनको लिये ही वे फूलते हुए भरतजीके सामने पहुँचे; परंतु वहाँ प्रेममूर्ति भरतजीको देखते ही वे दोनों यह समझकर सकुचा गये कि वास्तवमें प्रेमके धनी तो भरतजी ही हैं, जिन्होंने बड़े भाईके लिये यह दशा स्वीकार की है। हम तो नामके ही प्रेमी हैं, जो राज्यके लिये भाइयोंको मरवाकर भगवान्के सखा कहलानेका दावा करते हैं।) ॥ २०७ ॥ राम सराहे भरत उठि मिले राम सम जानि। तदपि बिभीषन कीसपति तुलसी गरत गलानि ॥२०८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यद्यपि श्रीरामजीने विभीषण

दोहावली ७३ और सुग्रीवकी बड़ी प्रशंसा की और भरतजी भी उन्हें श्रीरामजीके समान समझकर ही उठकर उनसे मिले, तथापि वे ग्लानिसे गले ही जाते थे (मन-ही-मन सोचते थे कि कहाँ तो भरत-सरीखे निःस्वार्थ प्रेमी भाई और कहाँ हम अपने बड़े भाइयोंको मरवानेवाले स्वार्थी भाई !) ॥२०८॥ भरत स्याम तन राम सम सब गुन रूप निधान। सेवक सुखदायक सुलभ सुमिरत सब कल्यान ॥२०९॥ भावार्थ—श्रीभरतजीका श्रीरामजीके समान ही श्याम शरीर है और उन्हींके समान वे रूप गुणके खजाने तथा सेवकोंको सुख देनेवाले हैं। इनका स्मरण करते ही सब कल्याण सहज ही मिल जाते हैं ॥२०९॥ लक्ष्मणमहिमा ललित लखन मूरति मधुर सुमिरहु सहित सनेह। सुख संपति कीरति बिजय सगुन सुमंगल गेह ॥२१०॥ भावार्थ—जो सुख, सम्पत्ति, कीर्ति, विजय, सद्गुण और सुन्दर कल्याण के घर हैं, उन परम मनोहर श्रीलक्ष्मणजीकी मधुर मूर्तिका प्रेमसहित स्मरण करो ॥२१०॥ शत्रुघ्नमहिमा नाम सत्रुसूदन सुभग सुषमा सील निकेत। सेवत सुमिरत सुलभ सुख सकल सुमंगल देत ॥२११॥ भावार्थ—शोभा और शीलके धाम श्रीशत्रुघ्नजीके सुन्दर नामका भजन और स्मरण करनेसे सब सुख सुलभ हो जाते हैं और वह भजन स्मरण सब सुन्दर मङ्गलोंको देनेवाला है ॥२११॥

७४ दोहावली कौसल्यामहिमा कौसल्या कल्यानमइ मूरति करत प्रनाम । सगुन सुमंगल काज सुभ कृपा करहिँ सियराम ॥२१२॥ भावार्थ—श्रीकौशल्याजी कल्याणमयी मूर्ति हैं, उन्हें प्रणाम करनेपर सब शुभ सगुन और सुन्दर मङ्गल होते हैं और सब कार्य सफल होते हैं तथा श्रीसीतारामजी कृपा करते हैं ॥२१२॥ सुमित्रामहिमा सुमिरि सुमित्रा नाम जग जे तिय लेहिं सनेम । सुअन लखन रिपुदवन से पावहिं पति पद प्रेम ॥२१३॥ भावार्थ—जगत्में जो स्त्रियाँ सुमित्राजीके नामको स्मरणकर [पातिव्रत] नियम लेती हैं, वे लक्ष्मण और शत्रुघ्न-जैसे पुत्र तथा पतिके चरणोंमें प्रेम प्राप्त करती हैं ॥२१३॥ सीतामहिमा सीता चरन प्रनाम करि सुमिरि सुनाम सुनेम । होहिं तीय पतिदेवता प्राननाथ प्रिय प्रेम ॥२१४॥ भावार्थ—भलीभाँति नियमपूर्वक श्रीसीताजीके चरणोंमें प्रणाम करनेसे और उनके सुन्दर नामका स्मरण करनेसे स्त्रियाँ पतिव्रता हो जाती हैं और अपने प्रिय प्राणनाथका प्रेम प्राप्त करती हैं ॥२१४॥ रामचरितकी पवित्रता तुलसी केवल कामतरु रामचरित आराम । कलितरु कपि निसिचर कहत हमहिं किए बिधि बाम ॥२१५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचरितरूपी बगीचेमें केवल कल्पवृक्ष ही हैं (अर्थात् उसमें केवल पुण्यपुरुषोंको ही

दोहावली ७५ स्थान हैं)। सुग्रीवादि बंदर और विभीषणादि राक्षस कहते हैं कि विधाता हमारे लिये विपरीत था जिसने हम लोगोंको कलितरु (पाप- देह) बनाया, परंतु कृपामय श्रीरघुनाथजीने हमें भी अपने उस चरित्ररूप पावन उद्यानमें स्थान दे दिया॥२१५॥ कैकेयीकी कुटिलता मातु सकल सानुज भरत गुरु पुर लोग सुभाउ। देखत देख न कैकइहि लंकापति कपिराउ॥२१६॥ भावार्थ—लंकेश्वर विभीषण और वानरराज सुग्रीव सब माताओं- का, लक्ष्मण और शत्रुघ्नसहित भरतजीका, गुरुओंका तथा अयोध्या- वासियोंका [श्रीरामजीके प्रेमसे भरा हुआ] स्वाभाव [बड़े ही आदर तथा आह्लादके साथ] देखते हैं, परंतु कैकेयीको (उसका राम- विरोधी स्वभाव) नहीं देख सकते (उसका वैसा स्वभाव देखकर उन्हें दुःख होता है) ॥२१६॥ सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥२१७॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके स्वभावसे ही सरल वचनोंको दुर्बुद्धि- कैकेयीने टेढ़ा ही समझा। यद्यपि जल समान ही होता है तथापि जोंक उसमें टेढ़ी चाल से ही चलती है ॥२१७॥ दशरथमहिमा दसरथ नाम सुकामतरु फलइ सकल कल्यान। धरनि धाम धन धरम सुत सदगुन रूप निधान॥२१८॥ भावार्थ—दशरथजीका नाम सुन्दर कल्पवृक्ष है; [सेवा करने-

७६ दोहावली पर यानी 'दशरथ' नामका जप करनेपर] उसमें पृथ्वी, घर, धन, धर्म, सद्गुणी और रूपनिधान पुत्र—इस प्रकार सभी कल्याणमय फल फलते हैं॥२१८॥ तुलसी जान्यो दसरथहिं धरमु न सत्य समान । रामु तजे जेहि लागि बिनु राम परिहरे प्रान ॥२१९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दशरथजीने ही इस तत्त्व- को समझा था कि सत्यके समान कोई भी धर्म नहीं है। जिस सत्यके लिये उन्होंने श्रीरामको त्याग दिया और श्रीरामके बिरहमें प्राण त्याग दिये ॥२१९॥ राम बिरहँ दसरथ मरन मुनि मन अगम सुमीचु । तुलसी मंगल मरन तरु सुचि सनेह जल सींचु ॥२२०॥ भावार्थ—श्रीरामजीके विरहमें दशरथजी मर गये, ऐसी शुभ मृत्यूतक मुनियोंके मन भी नहीं पहुँच सकते। तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसे मङ्गलमय मृत्युरूपी वृक्षको पवित्र (अनन्य और निष्काम) श्रीरामप्रेमरूपी जलसे सींचते रहो (अर्थात् श्रीराममें तुम्हारा प्रेम होगा तो तुम्हारी भी ऐसी ही दुर्लभ मृत्यु होगी) ॥२२०॥ सोरठा जीवन मरन सुनाम जैसें दसरथ राव को। जियत खिलाए राम राम बिरहँ तनु परिहरेउ ॥२२१॥ भावार्थ—जीवन और मृत्यु दोनोंमें ही जिस प्रकार महाराज दशरथजीका नाम हुआ (वैसा किसीके लिये भी सम्भव नहीं है)। जीवनकालमें उन्होंने भगवान श्रीरामको गोद खिलाया और शरीर छोड़ा तो श्रीरामके विरहमें ॥२२१॥

दोहावली ७७ जटायुका भाग्य दोहा प्रभुहि बिलोकत गोद गत सिय हित घायल नीचु। तुलसी पाई गीधपति मुकुति मनोहर मीचु ॥१२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गृध्रराज जटायुको धन्य हैं, जो सीताके [छुड़ाने] के लिये घायल हुए और नीच शरीर होनेपर भी प्रभुकी गोदमें उनके मधुर मुखारविन्दको निरखते हुए ही मनोहर मृत्यु और मुक्ति प्राप्त की ॥१२२॥ बिरत करम रत भगत मुनि सिद्ध ऊँच अरु नीचु। तुलसी सकल सिहात सुनि गीधराज की मीचु ॥१२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गृध्रराजकी (इस प्रकार- की दुर्लभ) मृत्युका समाचार सुनकर विरक्त, कर्मयोगी, भक्त, ज्ञानी, मुनि, सिद्ध, ऊँच और नीच—सभी उनकी ईर्ष्या करने लगे (सबने चाहा कि हमें भी ऐसी ही मृत्यु मिले ॥१२३॥ मुए मरत मरिहैं सकल घरी पहरके बीचु। लही न काहूँ आजु लौं गीधराज की मीचु ॥१२४॥ भावार्थ—आजतक कितने मर गये, वर्तमानमें कितने मर रहे हैं और भविष्यमें घड़ी-पहरके अन्तरसे सभी मरेंगे ही; परंतु आजतक जटायुकी-सी सुन्दर मौत किसीने नहीं पायी ॥१२४॥ मुएँ मुकुत जीवत मुकुत मुकुत मुकुत हूँ बीचु। तुलसी सबही तें अधिक गीधराजकी मीचु ॥१२५॥ भावार्थ—कोई मरनेपर मुक्त होता है, कोई जीता ही मुक्त (जीवन्मुक्त) हो जाता है; मुक्त-मुक्तमें भी भेद होता है। तुलसी- CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

७८ दोहावली दासजी कहते हैं, इन सभी मुक्तियोंसे बढ़कर गृध्रराजकी मृत्यु हुई ॥२२५॥ रघुबर बिकल बिहंग लखि सो बिलोकि दोउ बीर । सिय सुधि कहि सिय राम कहि देह तजी अति धीर ॥२२६॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीने [पीड़ासे] व्याकुल [घायल] जटायु- को देखा, उस धीरबुद्धि जटायुने भी दोनों भाइयोंको [नेत्र भरकर] देखा [देखते ही पीड़ामुक्त होकर] उन्हें सीताजीका समाचार सुनाकर, 'सीताराम', 'सीताराम' कहते हुए [और भगवान्को देखते हुए ही उनकी गोदमें] शरीर छोड़ दिया ॥२२६॥ दसरथ तें दसगुन भगति सहित तासु करि काजु । सोचत बंधु समेत प्रभु कृपासिंधु रघुराजु ॥२२७॥ भावार्थ—कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीने अपने पिता दशरथजीसे दसगुनी भक्तिसहित उसका मृतकसंस्कार किया और भाई लक्ष्मणजी- सहित उसकी मृत्युके लिये शोक करने लगे ॥२२७॥ रामकृपाकी महत्ता केवट निसिचर बिहग मृग किए साधु सनमानि । तुलसी रघुबर की कृपा सकल सुमंगल खानि ॥२२८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी कृपा सब सुमङ्गलोंकी खान है; उस रामकृपाने केवट, राक्षस (विभीषण), पक्षी (जटायु) और पशुओं (बंदर-भालु आदि) को भी सम्मान देकर साधु बना दिया ॥२२८॥ हनुमत्स्मरणकी महत्ता मंजुल मंगल मोदमय मूरति मारुत पूत । सकल सिद्धि कर कमल तल सुमिरत रघुबर दूत ॥२२९॥