दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ६१ 'त्राहि-त्राहि' पुकारा। पहली त्राहि कहते ही वस्त्र बढ़ गया, दूसरीमें भगवान् व्याकुल हो उठे कि द्रौपदीको सतानेवालोंके लिये अब क्या किया जाय ? [तीसरीमें] चकित होकर अपने (दुष्टसंहाररूपी) कार्यकी इच्छा करने लगे (अर्थात् दुःशासनादि कौरवोंके संहारका निश्चय कर लिया अर्थात् भक्तकी सच्चे मनसे की हुई एक भी पुकार व्यर्थ नहीं जाती ॥१६९॥ सुख जीवन सब कोउ चहत सुख जीवन हरि हाथ। तुलसी दाता मागनेउ देखिअत अबुध अनाथ ॥१७०॥ भावार्थ-सब कोई सुखमय जीवन चाहते हैं, परंतु सुखमय जीवन श्रीहरिके हाथमें है। तुलसीदासको तो जगत्में दाता और भिखारी दोनों ही मूर्ख और अनाथ दिखायी देते हैं (दाता इसलिये मूर्ख हैं कि वे दानके अभिमानसे बँध जाते हैं और भिखारी इसलिये अनाथ हैं कि वे सर्वलोकमहेश्वर, सबके सुहृद्, अकारण कृपालु, भगवान्को छोड़कर नाशवान् लोगोंसे नाशवान् भोग माँगते हैं ॥१७०॥ कृपिन देइ पाइअ परो बिनु साधें सिधि होइ । सीतापति सनमुख समुझि जो कीजै सुभ सोइ ॥१७०॥ भावार्थ-कृपण दे देता है, पड़ा मिल जाता है, बिना ही साधनके सिद्धि हो जाती है। श्रीजानकीनाथको सम्मुख समझकर (उनकी कृपापर भरोसा करके) जो कुछ कीजिये, वही शुभ हो जाता है ॥१७१॥ दंडक बन पावन करन चरन सरोज प्रभाउ । ऊसर जामहिं खल तरहिं होइ रंक ते राउ ॥१७२॥ भावार्थ-दण्डकवनको पवित्र (शापमुक्त) करनेवाले भगवान्के