दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ दोहावली चरणकमलोंके प्रभावसे ऊसर भूमिमें भी अन्न उत्पन्न हो जाता है, दुष्ट तर जाते हैं और रङ्क (दरिद्री) भी राजा बन जाता है ॥१७२॥ बिनहीं रितु तरुबर फरत सिला द्रबति जल जोर । राम लखन सिय करि कृपा जब चितवत जेहि ओर॥१७३॥ भावार्थ—श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी जब कृपा करके जिसकी तरफ ताक लेते हैं तब बिना ही ऋतुके वृक्ष फलने लगते हैं और पत्थरकी शिलाओंसे बड़े जोरसे जल बहने लगता है ॥१७३॥ सिला सुतिय भइ गिरि तरे मृतक जिए जग जान । राम अनुग्रह सगुन सुभ सुलभ सकल कल्यान ॥१७४॥ भावार्थ—श्रीरामजीकी कृपासे सब शुभ सद्गुण आ जाते हैं, सब प्रकारके कल्याण सुलभ हो जाते हैं (सहज ही मिल जाते हैं)। इस बातको तमाम जगत् जानता है कि श्रीरामकृपासे शिला सुन्दरी स्त्री (अहल्या) बन गयी, समुद्रमें पहाड़ तर गये और युद्धमें मरे हुए वानर-भालु पुनः जीवित हो गये ॥१७४॥ सिला साप मोचन चरन सुमिरहु तुलसीदास । तजहु सोच संकट मिटिहिं पूजहि मन की आस ॥१७५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि शिलाको (अहल्याको) शापसे मुक्त करनेवाले श्रीरामजीके चरणोंका स्मरण करो और सब चिन्ताओंका त्याग कर दो। इस प्रकार अनन्य श्रीरामचिन्तनसे तुम्हारे सब संकट दूर हो जायँगे और मनोकामना पूर्ण हो जायगी ॥१७५॥ मुए जिआए भालु कपि अवध बिप्र को पूत । सुमिरहु तुलसी ताहि तू जाको मारुति दूत ॥१७६॥