भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली ६३ भावार्थ—जिन्होंने लङ्कामें मरे हुए बंदर-भालुओंको जिला दिया और अयोध्यामें मरे हुए एक ब्राह्मणके बालकको जीवित कर दिया, हे तुलसीदास ! तुम उनका स्मरण करो जिनके दूत पवनपुत्र हनुमान जी हैं (जो सञ्जीवनी बूटी लाकर लक्ष्मणजीको जीवित करनेवाले हैं) ॥१७६॥ प्रार्थना काल करम गुन दोष जग जीव तिहारे हाथ । तुलसी रघुबर रावरो जानु जानकीनाथ ॥१७७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रघुनाथजी ! काल, कर्म, गुण, दोष, जगत्-जीव—सब आपके ही अधीन हैं। हे जानकीनाथ ! इस तुलसीको भी अपना ही जानकर अपनाइये ॥१७७॥ रोग निकर तनु जरठपनु तुलसी संग कुलोग । राम कृपा कै पालिए दीन पालिबे जोग ॥१७८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—मेरा शरीर रोगोंकी खान है, वृद्धावस्था है और बुरे लोगोंका सङ्ग है। हे राम ! आप कृपा करके मुझे अपनाकर मेरा पालन कीजिये, यह दीन पालने योग्य है ॥१७८॥ मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर । अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥१७९॥ भावार्थ—हे रघुवीर ! मेरे समान तो कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनबन्धु नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंश- मणि ! जन्म-मरणके महान् भयका नाश कीजिये ॥१७९॥ भव भुअंग तुलसी नकुल डसत ग्यान हरि लेत । चित्रकूट एक औषधी चितवत होत सचेत ॥१८०॥