दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 68, कुल 196 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ दोहावली भावार्थ—संसाररूपी सर्प तुलसीदासरूपी नेवलेको डसते ही उसका सारा ज्ञान हरण कर लेता है; परन्तु चित्रकूट एक ऐसी औषध है कि उसकी ओर देखते ही वह पुनः सचेत हो जाता है (चित्रकूटकी बड़ी महिमा है) ॥१८०॥ हौँहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास । साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास ॥१८१॥ भावार्थ—[तुलसीदासजी कहते हैं कि] सब लोग मुझे श्रीराम- जीका दास कहते हैं और मैं भी बिना लज्जा-संकोचके कहलाता हूँ (कहनेवालोंका विरोध नहीं करता) । कृपालु श्रीरामजी इस उपहास- को सहते हैं कि श्रीजानकीनाथजी-सरीखे स्वामीका तुलसीदास-सा सेवक है ! ॥१८१॥ रामराज्यकी महिमा राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि । राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि ॥१८२॥ भावार्थ—रामराज्यमें सभी नर-नारी अपने-अपने धर्ममें रत होकर शोभित हो रहे हैं। कहीं भी राग (आसक्ति), क्रोध, दोष और दुःख नहीं हैं; धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पदार्थ सुलभ हो रहे हैं ॥१८२॥ राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास । तरु सुरतरु सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास ॥१८३॥ भावार्थ—रामराज्यमें सब प्रकारसे सन्तोष और सुख है, घरमें तथा वनमें दोनों ही जगह सब प्रकारकी सुविधाएँ हैं । वृक्ष कल्प- वृक्षके समान और पृथ्वी कामधेनुके समान इच्छामात्रको पूर्ण करती है और मनोवाञ्छित भोग-विलास सबको प्राप्त हैं ॥१८३॥