दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ६५ खेती बनि बिद्या बनिज सेवा सिलिप सुकाज । तुलसी सुरतरु सरिस सब सुफल राम कें राज ॥१८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामजीके राज्यमें खेती, मजदूरी, विद्या, व्यापार, सेवा और कारीगरी तथा अन्य सुन्दर कार्य कल्पवृक्षके समान सब सुन्दर शुभ फलोंके देनेवाले हैं ॥१८४॥ दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज । जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥१८५॥ भावार्थ—श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें दण्ड केवल संन्यासियोंके हाथोंमें रह गया था और भेद [सूर-तालके भेदके अर्थमें] केवल नाचनेवालोंके नृत्य-समाजमें था; और 'जीतो' शब्द केवल मनको जीतनेके प्रसङ्गमें ही सुन पड़ता था (राजनीतिमें साम, दान, दण्ड, भेद—ये चार शत्रुको जीतनेके उपाय कहे गये हैं। श्रीरामराज्यमें कोई शत्रु था ही नहीं, जिसके लिये इनसे काम लेना पड़ता; अतएव दण्ड और भेदके नामसे तो क्रमशः उपर्युक्त वस्तु तथा भाव रह गये थे और साम, दान स्वाभाविक सात्त्विक गुण हैं ही) ॥१८५॥ कोपें सोच न पोच कर करिअ निहोर न काज । तुलसी परमिति प्रीति की रीति राम कें राज ॥१८६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें प्रेमकी रीति सीमातक पहुँच गयी थी। इनसे न तो किसीके क्रोध करनेपर कोई उसकी चिन्ता ही करता और न उसका कोई अपकार ही करता। सब लोग सबका काम प्रेमसे करते। काम करनेमें कोई किसीपर अहसान नहीं जताता ॥१८६॥ दोहा० ५-६—,