भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली ७५ स्थान हैं)। सुग्रीवादि बंदर और विभीषणादि राक्षस कहते हैं कि विधाता हमारे लिये विपरीत था जिसने हम लोगोंको कलितरु (पाप- देह) बनाया, परंतु कृपामय श्रीरघुनाथजीने हमें भी अपने उस चरित्ररूप पावन उद्यानमें स्थान दे दिया॥२१५॥ कैकेयीकी कुटिलता मातु सकल सानुज भरत गुरु पुर लोग सुभाउ। देखत देख न कैकइहि लंकापति कपिराउ॥२१६॥ भावार्थ—लंकेश्वर विभीषण और वानरराज सुग्रीव सब माताओं- का, लक्ष्मण और शत्रुघ्नसहित भरतजीका, गुरुओंका तथा अयोध्या- वासियोंका [श्रीरामजीके प्रेमसे भरा हुआ] स्वाभाव [बड़े ही आदर तथा आह्लादके साथ] देखते हैं, परंतु कैकेयीको (उसका राम- विरोधी स्वभाव) नहीं देख सकते (उसका वैसा स्वभाव देखकर उन्हें दुःख होता है) ॥२१६॥ सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान॥२१७॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीके स्वभावसे ही सरल वचनोंको दुर्बुद्धि- कैकेयीने टेढ़ा ही समझा। यद्यपि जल समान ही होता है तथापि जोंक उसमें टेढ़ी चाल से ही चलती है ॥२१७॥ दशरथमहिमा दसरथ नाम सुकामतरु फलइ सकल कल्यान। धरनि धाम धन धरम सुत सदगुन रूप निधान॥२१८॥ भावार्थ—दशरथजीका नाम सुन्दर कल्पवृक्ष है; [सेवा करने-