दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ६७ श्रीरामकी कीर्ति तुलसी बिलसत नखत निसि सरद सुधाकर साथ । मुकुता झालरि झलक जनु राम सुजसु सिसु हाथ ॥१९०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके साथ रात्रिमें नक्षत्रावली ऐसी शोभा देती है, मानो श्रीरामजीके सुयशरुपी शिशुके हाथमें मोतियोंकी झालर झलमला रही हो ॥ १६० ॥ रघुपति कीरति कामिनी क्यों कहै तुलसीदासु । सरद अकास प्रकास ससि चारु-चिबुक तिल जासु ॥१९१॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीकी कीर्तिरुपी कामिनीका तुलसीदास कैसे बखान कर सकता है ? शरत्पूर्णिमाके आकाशमें प्रकाशित होने- वाला चन्द्रमा मानो उस कीर्ति-कामिनीकी ठुड्डीका तिल है ॥१६१॥ प्रभु गुन गन भूषन बसन बिसद बिसेष सुबेस । राम सुकीरति कामिनी तुलसी करतब केस ॥१९२॥ भावार्थ—प्रभु श्रीरामजीके गुणोंके समूह श्रीरामजीकी सुन्दर कीर्तिरूपी कामिनीके वस्त्र और आभूषण हैं, जिनसे उसका वेष बहुत ही स्वच्छ और सुन्दर जान पड़ता है। और तुलसीदासकी [उस कीर्तिका वर्णन करनारूपी] जो करतूत है, वह [अनधिकार प्रयास होनेके कारण अत्यन्त काली है, इसलिये] उसके केश हैं ॥ १६२ ॥ राम चरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु । सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ॥१९३॥ भावार्थ—श्रीरामचन्द्रजीके चरित्र पूर्णिमाके चन्द्रमाकी किरणोंके समान सभीको सुख देनेवाले हैं, परंतु सज्जनरूपी कुमुद और चकोरोंके चित्तके लिए तो वे विशेषरूपसे हितकारी और महान् लाभरूप हैं ॥ १६३ ॥