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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 196 में से

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दोहावली ५१ सोरठा अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल । भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥१३४॥ भावार्थ—हे धीरबुद्धि ! ऐसा विचारकर सारे कुतर्कों और संशयोंको त्यागकर करुणाकी खान परम मनोहर दिव्यविग्रह, परम सुखदायक रघुवीर श्रीरामजीका भजन करिये ॥ १३४ ॥ भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन । तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन ॥१३५॥ भावार्थ—सुखके खजाने और करुणाके धाम भगवान् भाव (प्रेम) के वश हैं। अतएव ममता, मद और मानको त्यागकर निरन्तर सीतापति श्रीरामजीका भजन ही करना चाहिये ॥ १३५ ॥ कहहिं बिमलमति संत बेद पुरान बिचारि अस । द्रवहिं जानकी कंत तब छूटै संसार दुख ॥१३६॥ भावार्थ—निर्मल बुद्धिवाले संत वेद और पुराणोंका विचार करके यही कहते हैं कि जानकीनाथ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी जब कृपा करते हैं, तभी संसारके दुःखोंसे छुटकारा मिलता है ॥ १३६ ॥ बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु । गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥१३७॥ भावार्थ—वेद-पुराण कहते हैं कि क्या बिना गुरुके ज्ञान हो सकता है, अथवा वैराग्यके बिना क्या ज्ञान प्राप्त हो सकता है ? और श्रीहरिकी भक्ति बिना क्या कभी [सच्चे] सुखकी प्राप्ति हो सकती है ? ॥ १३७ ॥

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