भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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५० दोहावली लव निमेष परमानु जुग बरस कलप सर चंड । भजसि न मन तेहि राम कहँ कालु जासु कोदंड ॥१३०॥ भावार्थ—हे मन ! तू उन श्रीरामको क्यों नहीं भजता; जिनका काल तो धनुष है और लव, निमेष, परमाणु, युग, वर्ष और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं ॥ १३० ॥ तब लगि कुसल न जीव कहूँ सपनेहुँ मन बिश्राम । जब लगि भजत न राम कहूँ सोकधाम तजि काम॥१३१॥ भावार्थ—जबतक यह जीव शोकके घर काम (विषयोंकी कामना) को त्यागकर श्रीरामजीको नहीं भजता, तबतक उसके लिये न तो कुशल है और न स्वप्नमें भी [कभी] उसके मनको शान्ति मिलती है ॥ १३१ ॥ बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग । मोह गएँ बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग ॥१३२॥ भावार्थ—सत्संगके बिना भगवान्‌की लीला-कथाएँ सुनने को नहीं मिलतीं, भगवान्‌की रहस्यमयी कथाओंके सुने बिना मोह नहीं भागता और मोहका नाश हुए बिना भगवान् श्रीरामजीके चरणोंमें सुदृढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता ॥ १३२ ॥ बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु । राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥१३३॥ भावार्थ—भगवान्‌पर श्रद्धा-विश्वास हुए बिना उनकी भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते नहीं और श्रीरामजीकी कृपा बिना जीव स्वप्नमें विश्राम (शान्ति) नहीं पाता ॥ १३३ ॥