भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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दोहावली ४३ रामप्रेमकी सर्वोत्कृष्टता जायँ कहब करतूति बिनु जायँ जोग बिन छेम । तुलसी जायँ उपाय सब बिना राम पद प्रेम ॥१०३॥ भावार्थ—बिना करनी किये केवल कथनमात्र व्यर्थ है, बिना क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) के योग (अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति) व्यर्थ हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामके चरणोंमें प्रेम हुए बिना सब साधन व्यर्थ हैं ॥ १०३ ॥ लोग मगन सब जोगहीं जोग जायँ बिनु छेम । त्यों तुलसी के भावगत राम प्रेम बिनु नेम ॥१०४॥ भावार्थ—लोग सब योगमें ही (अप्राप्त वस्तुके प्राप्त करनेके काममें ही) लगे हैं, परंतु क्षेम (प्राप्त वस्तुकी रक्षा) का उपाय किये बिना योग व्यर्थ है। इसी प्रकार तुलसीदासके विचारसे श्रीरामजीके प्रेम बिना सभी नियम व्यर्थ हैं ॥१०४॥ श्रीरामकी कृपा राम निकाई रावरी है सबही को नीक । जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥१०५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामजी ! आपकी भलाई (सुहृद्भाव) से सभीका भला है। अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है। यदि यह बात सत्य है तो तुलसी- दासका भी सदा कल्याण ही है ॥१०५॥ तुलसी राम जो आदरयो खोटो खरो खरोइ । दीपक काजर सिर धरयो धरयो सुघरयो धरोइ ॥१०६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको श्रीरामने आदर दे