दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ दोहावली दिया (अपना लिया) वह बुरा भी भला, सदा भला ही है। दीपकने जब काजलको अपने सिरपर धारण कर लिया तो फिर कर ही लिया ॥ १०६॥ तनु बिचित्र कायर बचन अहि अहार मन घोर । तुलसी हरि भए पच्छधर ताते कह सब मोर ॥१०७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मोरका रंग-बिरंगा विचित्र शरीर है, कायरकी-सी उसकी बोली है, साँप उसका भोजन है और कठोर मन है। इतने अवगुण होनेपर भी भगवान् श्रीकृष्णने उसकी पाँखोंको सिरपर धारण कर लिया—भगवान् उसका पक्ष रखनेवाले हो गये, तो सभी उससे प्रेम करते हुए 'मोर, मोर' (मेरा, मेरा) कहने लगे ॥१०७॥ लहइ न फूटी कौड़िहू को चाहै केहि काज । सो तुलसी महँगो कियो राम गरीबनिवाज ॥१०८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसको एक फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती थी (जिसकी कोई प्रतिष्ठा नहीं थी), उसको भला कौन चाहता और किसलिये चाहता। उसी तुलसीको गरीब- निवाज श्रीरामजीने आज महँगा कर दिया (उसका गौरव बढ़ा दिया) ॥१०८॥ घर घर माँगे टूक पुनि भूपति पूजे पाय । जे तुलसी तब राम बिनु ते अब राम सहाय ॥१०९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जिस समय मैं रामसे (श्रीरामके आश्रयसे) रहित था, उस समय घर-घर टुकड़े माँगता था। अब जो श्रीरामजी मेरे सहायक हो गये हैं तो फिर राजालोग मेरे पैर पूजते हैं ॥१०९॥