भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 196 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 46

४२ दोहावली बाधक सब सब के भए साधक भए न कोइ । तुलसी राम कृपालु तें भलो होइ सो होइ ॥१००॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि इस जगत्‌में तो सब लोग सबके बाधक ही होते हैं, साधक कोई किसीका नहीं है ! कृपालु श्रीरामजीसे ही भला होता है सो होता है ॥ १०० ॥ शिव और रामकी एकता संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास । ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥१०१॥ भावार्थ—[भगवान् श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं कि] जिनको शिवजी प्रिय हैं, किंतु जो मुझसे विरोध रखते हैं अथवा जो शिवजीसे विरोध रखते हैं और मेरे दास [बनना चाहते] हैं, वे मनुष्य एक कल्पतक घोर नरकमें पड़े रहते हैं [अतएव श्रीशंकरजीमें और श्रीरामजीमें कोई ऊँच-नीचका भेद नहीं मानना चाहिए।] ॥ १०१ ॥ बिलग बिलग सुख संग दुख जनम मरन सोइ रीति । रहिअत राखे राम कें गए ते उचित अनीति ॥१०२॥ भावार्थ—संसारसे दूर-दूर (आसक्तिरहित होकर) रहनेमें ही सुख है, आसक्तिमें ही दुःख है। यही बात जन्म और मृत्युमें भी है। श्रीरामके रक्खे अर्थात् वे रखना चाहते हैं, इसीलिये (आसक्ति- रहित होकर यहाँ रहना चाहिये। अन्यथा इस अनीतिसे (रागयुक्त संसारसे) जो चले गये, उन्होंने ही उचित किया (तात्पर्य यह है कि जगत्‌में या तो भगवत्प्रेमी होकर रहे या ऐसी चेष्टा करे जिसमें इससे मुक्ति ही मिल जाय) ॥ १०२ ॥