दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ दोहावली बालक कोसलपाल के सेवकपाल कृपाल। तुलसी मन मानस बसत मंगल मंजु मराल ॥१२२॥ भावार्थ—कोसलपति श्रीदशरथजीके बालक श्रीरामजी सेवकों की रक्षा करनेवाले तथा बड़े ही कृपालु हैं। वे तुलसीदासके मनरूपी मानसरोवरमें कल्याणरूप सुन्दर हंसके समान निवास करते हैं ॥१२२॥ भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जगजाल ॥१२३॥ भावार्थ—भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ, देवताओंके हितके लिये कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य-शरीर धारणकर [नाना प्रकारकी] लीलाएँ करते हैं, जिनके सुननेमात्रसे जगत्के [सारे] जंजाल कट जाते हैं ॥१२३॥ निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि। सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ॥१२४॥ भावार्थ—देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों [की रक्षा] के लिये भगवान् अपनी इच्छासे ही [किसी कर्मबन्धनसे नहीं] अवतार धारण करते हैं। वहाँ सगुण स्वरूपके उपासक भक्तगण [सालोक्य, सामीप्य सारूप्य, सार्ष्टि और सायुज्य] सब प्रकारके मोक्षोंका परित्याग कर [परिकररूपसे] उनके साथ रहते हैं ॥१२४॥ प्रार्थना परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥१२५॥ भावार्थ—हे परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम, मनकी [सारी]