दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
[ ७ ] विषय पृष्ठ-संख्या | विषय पृष्ठ-संख्या ७७—विषयोंकी आशा ही | ६२—ज्ञानमार्गकी कठिनता ९३ दुःखका मूल है ८८ | ९३—भगवद्भजनके अतिरिक्त ७८—मोहमहिमा ८६ | और सब प्रयत्न व्यर्थ है ६३ ७६—विषय-सुखकी हेयता ८६ | ९४—संतोषकी महिमा ६४ ८०—लोभकी प्रबलता ८६ | ९५—मायाकी प्रबलता और ८१—धन और ऐश्वर्यके मद | उसके तरनेका उपाय ६४ तथा कामकी व्यापकता ६० | ६६—गोस्वामीजीकी अनन्यता ९४ ८२—मायाकी फौज ६० | ६७—प्रेमकी अनन्यताके लिये ८३—काम, क्रोध, लोभकी | ॰चातकका उदाहरण ६५ प्रबलता ६० | ९८—एकाङ्गी अनुरागके अन्य ८४—काम, क्रोध, लोभके | उदाहरण १०५ सहायक ६० | ६६—मृगका उदाहरण १०५ ८५—मोहकी सेना ६१ | १००—सर्पका उदाहरण १०५ ८६—अग्नि, समुद्र, प्रबल स्त्री | १०१—कमलका उदाहरण १०६ और कालकी समानता ६१ | १०२—मछलीका उदाहरण १०६ ८७—स्त्री झगड़े और मृत्युकी | १०३—मयूरशिखा बूटीका जड़ है ६१ | उदाहरण १०७ ८८—उद्बोधन ६२ | १०४—अनन्यताकी महिमा १०८ ८६—गृहासक्ति श्रीरघुनाथजी- | १०५—गाढ़े दिनका मित्र ही के स्वरूपके ज्ञानमें | मित्र है १०८ बाधक है ६२ | १०६—बराबरीका स्नेह दुःख- ६०—काम-क्रोधादि एक-एक | दायक होता है १०६ अनर्थकारक हैं, फिर | १०७—मित्रतामें छल बाधक है १०६ सबकी तो बात ही क्या ? ६२ | १०८—वैर और प्रेम अंधे ६१—किसके
[ ८ ] विषय पृष्ठ-संख्या १०९—दानी और याचकका स्वभाव ११० ११०—प्रेम और बैर ही अनुकूलता और प्रति- कूलतामें हेतु हैं १११ १११—स्मरण और . प्रिय- भाषण ही प्रेमकी निशानी है १११ ११२—स्वार्थ ही अच्छाई- बुराईका मानदण्ड है १११ ११३—संसारमें प्रेममार्गके अधिकारी बिरले ही हैं ११२ ११४—कलियुगमें कपटकी प्रधानता ११२ ११५—कपट अन्ततक नहीं निभता ११३ ११६—कुटिल मनुष्य अपनी कुटिलताको नहीं छोड़ सकता ११३ ११७—स्वभावकी प्रधानता ११४ ११८—सत्सङ्ग और असत्सङ्गका परिणामगत भेद ११५ ११९—सज्जन और दुर्जनका भेद ११६ १२०—अवसरकी प्रधानता ११६ १२१—भलाई करना बिरले ही जानते हैं ११७ विषय पृष्ठ-संख्या १२२—संसारमें हित करने- वाले कम हैं ११७ १२३—वस्तु ही प्रधान है, आधार नहीं. ११८ १२४—प्रीति और बैरकी तीन श्रेणियाँ ११९ १२५—जिसे सज्जन ग्रहण करते हैं, उसे दुर्जन त्याग देते हैं ११९ १२६—प्रकृतिके अनुसार व्यवहारका भेद भी आवश्यक है १२० १२७—अपना आचरण सभी- को अच्छा लगता है १२० १२८—भाग्यवान् कौन है ? १२० १२९—साधुजन किसकी सराहना करते हैं ? १२१ १३०—सङ्गकी महिमा १२१ १३१—मार्गभेदसे फलभेद १२४ १३२—भलेके भला ही हो, यह नियम नहीं है १२४ १३३—विवेककी आवश्यकता १२४ १३४—कभी-कभी भलेको बुराई भी मिल जाती है १२५ १३५—सज्जन और दुर्जनकी परीक्षाके भिन्न-भिन्न प्रकार १२६
[ ६ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १३६—नीच पुरुषकी नीचता | १२६ | १५०—भूप-दरबारकी निन्दा | १३१ |
| १३७—सज्जनकी सज्जनता | १२६ | १५१—छल-कपट सर्वत्र | |
| १३८—नीचनिन्दा | १२७ | वर्जित है | १३२ |
| १३९—सज्जन-महिमा | १२८ | १५२—जगत्में सब सीधोंको | |
| १४०—दुर्जनोंका स्वभाव | १२८ | तंग करते हैं | १३३ |
| १४१—नीचकी निन्दासे उत्तम | १५३—दुष्टनिन्दा | १३३ | |
| पुरुषोंका कुछ नहीं | १५४—कपटीको पहचानना | ||
| घटता | १२८ | बड़ा कठिन है | १३७ |
| १४२—गुणोंका ही मूल्य है. | १५५—कपटीसे सदा डरना | ||
| दूसरोंके आदर- | चाहिये | १३७ | |
| अनादरका नहीं | १२९ | १५६—कपट ही दुष्टताका | |
| १४३—श्रेष्ठ पुरुषोंकी महिमा- | स्वरूप है | १३८ | |
| को कोई नहीं पा सकता | १२९ | १५७—कपटी कभी सुख नहीं | |
| १४४—दुष्ट पुरुषोंद्वारा की हुई | पाता | १३८ | |
| निन्दा-स्तुतिका कोई | १५८—पापही दुःखका मूल है | १३८ | |
| मूल्य नहीं है | १२९ | १५९—अविवेक ही दुःखका | |
| १४५—डाह करनेवालोंका कभी | मूल है | १३९ | |
| कल्याण नहीं होता | १३० | १६०—विपरीत बुद्धि विनाश- | |
| १४६—दूसरोंकी निन्दा करने- | का लक्षण है | १४० | |
| वालोंका मुंह काला | १६१—जोशमें आकर अनधि- | ||
| होता है | १३० | कार कार्य करनेवाला | |
| १४७—मिथ्या अभिमानका | पछताता है | १४१ | |
| दुष्परिणाम | १३० | १६२—समयपर कष्ट सह लेना | |
| १४८—नीचा बनकर रहना | हितकर होता है | १४१ | |
| ही श्रेष्ठ है | १३१ | १६३—भगवान् सबके रक्षक हैं | १४२ |
| १४९—सज्जन स्वाभाविक ही | १६४—लड़ना सर्वथा त्याज्य है | १४२ | |
| पूजनीय होते हैं | १३१ |
[ १० ] विषय पृष्ठ-संख्या १६५—क्षमाका महत्त्व १४३ १६६—क्रोधकी अपेक्षा प्रेमके द्वारा वशमें करना ही जीत है १४३ १६७—वीतराग पुरुषोंकी शरण ही जगत्के जंजालसे बचनेका उपाय है १४६ १६८—शूरवीर करनी करते हैं, कहते नहीं १४६ १६९—अभिमानके वचन कहना अच्छा नहीं १४७ १७०—दीनोंकी रक्षा करने- वाला सदा विजयी होता है १४७ १७१—नीतिका पालन करने- वालेके सभी सहायक बन जाते हैं १४७ १७२—सराहने योग्य कौन है ? १४८ १७३—अवसरपर चूक जानेसे बड़ी हानि होती है १४८ १७४—समयका महत्त्व १४६ १७५—विपत्तिकालके मित्र कौन हैं ? १४६ १७६—होनहारकी प्रबलता १५० १७७—परमार्थप्राप्तिके चार उपाय १५१ विषय पृष्ठ-संख्या १७८—विवेककी आवश्यकता १५१ १७९—विश्वासकी महिमा १५१ १८०—बारह नक्षत्र व्यापारके लिये अच्छे हैं १५२ १८१—चौदह नक्षत्रोंमें हाथसे गया हुआ धन वापस नहीं मिलता १५३ १८२—कौन-सी तिथियाँ कब हानिकारक होती हैं १५३ १८३—कौन-सा चन्द्रमा घातक समझना चाहिये ? १५४ १८४—किन-किन वस्तुओंका दर्शन शुभ है ? १५४ १८५—सात वस्तुएँ सदा मङ्गलकारी हैं १५४ १८६—श्रीरघुनाथजीका स्मरण सारे मङ्गलोंकी जड़ है १५४ १८७—यात्राके समयका शुभ स्मरण १५५ १८८—वेदकी अपार महिमा १५५ १८९—धर्मका परित्याग किसी भी हालतमें नहीं करना चाहिये १५६ १९०—दूसरेका हित ही करना चाहिये, अहित नहीं १५६ १९१—प्रत्येक कार्यकी सिद्धिमें तीन सहायक होते हैं १५६
[ ११ ] विषय पृष्ठ-संख्या १६२-नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम ही श्रेष्ठ है १५७ १६३-विवेकपूर्वक व्यवहार ही उत्तम है १५७ १६४-नेमसे प्रेम बड़ा है १५८ १६५-किस-किसका परित्याग कर देना चाहिये १५८ १६६-सात वस्तुओंको रस बिगड़नेसे पहले ही छोड़ देना चाहिये १५८ १६७-मनके चार कण्टक हैं १५९ १६८-कौन निरादर पाते हैं? १६० १६९-पाँच दुःखदायी होते हैं १६० २००-समर्थ पापीसे वैर करना उचित नहीं १६० २०१-शोचनीय कौन है ? १६१ २०२-परमार्थसे विमुख ही अंधा है १६१ २०३-मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते १६२ २०४-मूढ़ उपदेश नहीं सुनते १६२ २०५-बार-बार सोचनेकी आवश्यकता १६३ २०६-मूर्खशिरोमणि कौन है? १६३ २०७-ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है १६३ विषय पृष्ठ-संख्या २०८-जान-बूझकर अनीति करनेवालेको उपदेश देना व्यर्थ है १६४ २०९-जगत्के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख है १६४ २१०-प्रतिष्ठा दुःखका मूल है १६५ २११-भेड़ियाधंसानका उदाहरण १६६ २१२-ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं १६६ २१३-नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते हैं १६८ २१४-राजाको कैसा होना चाहिये ? १७० २१५-राजनीति १७१ २१६-किसका राज्य अचल हो जाता है ? १७३ २१७-आज्ञाकारी सेवक स्वामी- से बड़ा होता है ? १७७ २१८-मूलके अनुसार बढ़ने- वाला और बिना अभि- मान किये सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है १७७
[ १२ ] विषय पृष्ठ-संख्या | विषय पृष्ठ-संख्या २१९—त्रिभुवनके दीप कौन हैं? १७८ | २२९—जीवन किनका सफल है १८२ २२०—कीर्ति करतूतिसे ही | २३०—पिताकी आज्ञाका पालन होती है १७८ | सुखका मूल है १८२ २२१—बड़ोंका आश्रय भी | २३१—स्त्रीके लिये पति-सेवा मनुष्यको बड़ा बना | ही कल्याणदायिनी है १८३ देता है १७८ | २३२—शरणागतका त्याग पाप- २२२—कपटी दानीकी दुर्गति १७९ | का मूल है १८४ २२३—अपने लोगोंके छोड़ | २३३—कलियुगका वर्णन १८४ देनेपर सभी वैरी हो | २३४—और चाहे जो भी घट जाते हैं १७९ | जाय, भगवान्में प्रेम २२४—साधनसे मनुष्य ऊपर | नहीं घटना चाहिये १८६ उठता है और साधन | २३५—कुसमयका प्रभाव १८८ बिना गिर जाता है १८० | २३६—श्रीरामजीके गुणोंकी २२५—सज्जनको दुष्टोंका सङ्ग | महिमा १८९ भी मङ्गलदायक होता है १८० | २३७—कलियुगमें दो ही २२६—कलियुगमें कुटिलताकी | आधार हैं १९० वृद्धि १८१ | २३८—भगवत्प्रेम ही सब २२७—आपसमें मेल रखना | मङ्गलोंकी खान है १९० उत्तम है १८१ | २३९—दोहावलीके दोहोंकी २२८—सब समय समतामें | महिमा १९१ स्थित रहनेवाले पुरुष | २४०—रामकी दीनबन्धुता १९२ ही श्रेष्ठ हैं १८१ |
संख्या ८२ ८३ ८४ ८६ ८६ ८६ ८६ ८९ ९० ९० ९१ ९२
१. दोहा १-१५०: श्रीराम-नाम महिमा, अनन्य भक्ति एवं चातक-प्रेम
दोहावली श्रीरामचतुष्टय
श्रीसीतारामाभ्यां नमः दोहावली ध्यान राम बाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर। ध्यान सकल कल्यानमय सुरतरु तुलसी तोर ॥१॥ भावार्थ—भगवान् श्रीरामजीकी बायीं ओर श्रीजानकीजी हैं और दाहिनी ओर श्रीलक्ष्मणजी हैं—यह ध्यान सम्पूर्णरूपसे कल्याण- मय है। हे तुलसी ! तेरे लिये तो यह मनमाना फल देनेवाला कल्प- वृक्ष ही है ॥ १ ॥ सीता लखन समेत प्रभु सोहत तुलसीदास। हरषत सुर बरषत सुमन सगुन सुमंगल बास ॥२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मण- जीके सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुशोभित हो रहे हैं, देवतागण हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं। भगवान्का यह सगुण ध्यान सुमङ्गल— परम कल्याणका निवासस्थान है ॥ २ ॥ पंचबटी बट बिटप तर सीता लखन समेत। सोहत तुलसीदास प्रभु सकल सुमंगल देत ॥३॥ भावार्थ—पंचवटीमें वटवृक्षके नीचे श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजी- समेत प्रभु श्रीरामजी सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह ध्यान सब सुमङ्गलोंको देता है ॥ ३ ॥
१४ दोहावली राम-नाम-जपकी महिमा चित्रकूट सब दिन बसत प्रभु सिय लखन समेत । राम नाम जप जापकहि तुलसी अभिमत देत ॥४॥ भावार्थ—श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामजी चित्रकूटमें सदा-सर्वदा निवास करते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे राम-नामका जप जपनेवालेको इच्छित फल देते हैं ॥४॥ पय अहार* फल खाइ जपु राम नाम षट मास । सकल सुमंगल सिद्धि सब करतल तुलसीदास ॥५॥ भावार्थ—छः महीनेतक केवल दूधका आहार करके अथवा फल खाकर राम-नामका जप करो। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसा करनेसे सब प्रकारके सुमङ्गल और सब सिद्धियाँ करतलगत हो जायँगी (अर्थात अपने-आप ही मिल जायँगी) ॥५॥ राम नाम मनिदीप धरू जीह देहरीं द्वार । तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ॥६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश (लौकिक एवं पारमार्थिक ज्ञान) चाहता है तो *किसी-किसी प्रतिमें 'पय अह्लाई' पाठ मिलता है; जिसका अर्थ होगा '[चित्रकूटमें स्थित] पयस्विनी नदीमें स्नान करके'। 'पय अहार' और 'फल खाइ' पाठ लेनेसे 'अहार' और 'खाइ' में जो द्विरुक्ति प्रतीत होती है, उसीके निवारणके लिये सम्भवतः 'अहार' के स्थानमें 'अह्लाइ' संशोधन पीछेसे किया गया है। किंतु इस प्रकारके प्रयोग गोस्वामीजीने अन्यत्र भी किये हैं—देखिये रामचरितमानस अयोध्याकाण्डका दोहा १८८— पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग । करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥
दोहावली ३५ मुखरूपी दरवाजेकी देहलीपर रामनामरूपी [हवाके झोंके अथवा तेलकी कमीसे कभी न बुझनेवाला नित्य प्रकाशमय] मणिदीप रख दो (अर्थात् जीभके द्वारा अखण्डरूपसे श्रीराम-नामका जप करता रह) ॥६॥ हियँ निर्गुन नयनन्हि सगुन रसना राम सुनाम । मनहुँ पुरट संपुट लसत तुलसी ललित ललाम ॥७॥ भावार्थ—हृदयमें निर्गुण ब्रह्मका ध्यान, नेत्रोंके सामने प्रथम तीन दोहोंमें कथित सगुण स्वरूपकी सुन्दर झाँकी और जीभसे सुन्दर राम-नामका जप करना। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह ऐसा है मानो सोनेकी सुन्दर डिबियामें मनोहर रत्न सुशोभित हो। श्रीगुसाईंजीके मतसे 'राम' नाम निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान् दोनोंसे बड़ा है—'मोरें मत बड़ नाम दुहू तें'। नामकी इसी महिमाको लक्ष्यमें रखकर यहाँ नामको रत्न कहा गया है तथा निर्गुण ब्रह्म और सगुण भगवान्को उस अमूल रत्नको सुरक्षित रखनेके लिये सोनेका सम्पुट (डिबियाके नीचे-ऊपरके भाग) बताया गया है॥७॥ सगुन ध्यान रुचि सरस नहिं निर्गुन मन ते दूरि । तुलसी सुमिरहु रामको नाम सजीवन मूरि ॥८॥ भावार्थ—सगुणरूपके ध्यानमें तो प्रीतियुक्त रुचि नहीं है और निर्गुणस्वरूप मनसे दूर है (यानी समझमें नहीं आता) । तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसी दशामें रामनाम-स्मरणरूपी संजीवनी बूटीका सदा सेवन करो ॥८॥ एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ । तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—देखो, श्रीरघुनाथजीके नाम
१६ दोहावली (राम) के दोनों अक्षरोंमें एक 'र' तो (रेफ ॔ के रूपमें) सब वर्णोंके मस्तकपर छत्रकी भांति विराजता है और दूसरा 'म' (अनुस्वार, के रूपमें) सबके ऊपर मुकुट-मणिके समान सुशोभित होता है ॥९॥ नाम रामको अंक है सब साधन हैं सून। अंक गएँ कछु हाथ नहिं अंक रहें दस गून ॥१०॥ भावार्थ—श्रीरामजीका नाम अङ्क है और सब साधन शून्य (०) हैं। अङ्क न रहनेपर तो कुछ भी हाथ नहीं लगता, परंतु शून्यके पहले अङ्क आनेपर वे दसगुने हो जाते हैं (अर्थात् रामनामके जपके साथ जो साधन होते हैं, वे दसगुने लाभदायक हो जाते हैं), परंतु रामनामसे हीन जो साधन होता है वह कुछ भी फल नहीं देता ॥१०॥ नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ॥११॥ भावार्थ—कलियुगमें श्रीरामजीका नाम कल्पवृक्ष (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) है और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे तुलसीदास भाँगसे (विषयमदसे भरी और दूसरोंको भी विषयमद उपजानेवाली साधुओंद्वारा त्याज्य स्थितिसे) बदलकर तुलसीके समान (निर्दोष, भगवानका प्यारा, सबका आदरणीय और जगतको पावन करनेवाला) हो गया ॥११॥ राम नाम जपि जीहँ जन भए सुकृत सुखसालि। तुलसी इहाँ जो आलसी गयो आजु की कालि ॥१२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जीभसे रामनामका जप करके लोग पुण्यात्मा और परम सुखी हो गये; परंतु इस नाम- जपमें जो आलस्य करते हैं, उन्हें तो आज या कल नष्ट ही हुआ
दोहावली १७
समझो ॥१२॥ नाम गरीबनवाज को राज देत जन जानि । तुलसी मन परिहरत नहिं घूर बिनिआ की बानि ॥१३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गरीबनवाज (दीनबन्धु) श्रीरामजीका नाम ऐसा है, जो जपनेवालेको भगवान्का निज जन जानकर राज्य (प्रजापतिका पद या मोक्ष-साम्राज्यतक) दे डालता है। परंतु यह मन ऐसा अविश्वासी और नीच है कि घूरे (कूड़ेके ढेर) में पड़े दाने चुगनेकी ओछी आदत नहीं छोड़ता (अर्थात् गंदे विषयोंमें ही सुख खोजता है) ॥१३॥ कासीं बिधि बसि तनु तजैं हठि तनु तजैं प्रयाग । तुलसी जो फल सो सुलभ राम नाम अनुराग ॥१४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि काशीजीमें (पापोंसे बचते हुए) विधिवत् निवास करके शरीर त्यागनेपर और तीर्थराज प्रयागमें हठसे शरीर छोड़नेपर जो (मोक्षरूपी) फल मिलता है, वह रामनाममें अनुराग होनेसे सुगमतासे मिल जाता है। [यही नहीं; अनुरागपूर्वक रामनामके जापसे तो मोक्षके आधार साक्षात् भगवान्- की प्राप्ति हो जाती है] ॥१४॥ मीठो अरु कठवति भरो रौंताई अरु छेम । स्वारथ परमारथ सुलभ राम नाम के प्रेम ॥१५॥ भावार्थ—(१) मीठा पदार्थ (अमृत) भी हो और कठौता भर- कर मिले, (२) राज्यादि अधिकार भी प्राप्त हों और क्षेमकुशल भी रहे (अर्थात् अभिमान और भोगोंसे बचकर रहा जाय) और (३) स्वार्थ भी सधे तथा परमार्थ भी सम्पन्न हो—ऐसा होना बहुत ही कठिन है; परंतु श्रीरामनामके प्रेमसे ये परस्परविरोधी
१८ दोहावली दुर्लभ बातें भी सुलभ हो जाती हैं (अर्थात् रामनाममें प्रेम होनेसे मधुर सुख भी मिलते हैं और वे दुःखरहित भरपूर होते हैं; राज्य भी मिल सकता है और उसमें अभिमान तथा विषयासक्तिका अभाव होनेके कारण गिरनेकी भी गुंजाइश नहीं रहती, पारमार्थिक स्थितिपर अचल रहते हुए भी राज्य-शासन किया जा सकता है और परमार्थ ही स्वार्थ बन जाता है) ॥१५॥ राम नाम सुमिरत सुजस भाजन भए कुजाति । कुतरुक सुरपुर राजमग लहत भुवन बिख्याति ॥१६॥ भावार्थ—रामनामका स्मरण करनेसे (गणिका एवं अजामिल आदि) नीच जाति या नीच स्वभाववाले भी सुन्दर कीर्तिके पात्र हो गये। स्वर्गके राजमार्ग (गङ्गाजीके तट) पर स्थित बुरे वृक्ष भी त्रिभुवनमें ख्याति पा जाते हैं ॥१६॥ स्वारथ सुख सपनेहुँ अगम परमारथ न प्रबेस । राम नाम सुमिरत मिटहिं तुलसी कठिन कलेस ॥१७॥ भावार्थ—जिन लोगोंको सांसारिक सुख सपनेमें भी नहीं मिलते और परमार्थमें—मोक्षप्राप्तिके मार्गमें जिनका प्रवेश नहीं है, तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामनामका स्मरण करनेसे उनके भी कठिन क्लेश मिट जाते हैं (अर्थात् उनके स्वार्थ-परमार्थ दोनोंकी सिद्धि सहजहीमें हो जाती है) ॥१७॥ मोर मोर सब कहँ कहसि तू को कहु निज नाम । कै चुप साधहि सुनि समुझि कै तुलसी जपु राम ॥१८॥ भावार्थ—तू सबको मेरा-मेरा कहता है, परंतु यह तो बता कि तू कौन है ? और तेरा अपना नाम क्या है ? तुलसीदासजी कहते हैं कि अब या तो तू इसको (नाम और रूपके रहस्यको) सुन और
दोहावली १९ समझकर मौन हो जा (मेरा-मेरा कहना छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित हो जा) या श्रीरामजीका नाम जप ॥ १८ ॥ हम लखि लखहि हमार लखि हम हमार के बीच । तुलसी अलखहि का लखहि राम नाम जप नीच ॥ १९॥ भावार्थ—[एक साधनहीन 'अलखिया' साधु केवल 'अलख- अलख' चिल्लाया करता था, उसे फटकारते हुए तुलसीदासजी कहते हैं कि] तू पहले अपने स्वरूपको जान, फिर अपने यथार्थ 'अपने' ब्रह्मके स्वरूपका अनुभव कर। तदनन्तर अपने और ब्रह्मके बीचमें रहनेवाली मायाको पहचान। अरे नीच ! [इन तीनोंको समझे बिना] तू उस अलख परमात्माको क्या समझ सकता है ? अतः ['अलख-अलख' चिल्लाना छोड़कर] रामनामका जप कर ॥ १९ ॥ राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस । बरषत बारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास ॥ २०॥ भावार्थ—जो रामनामका सहारा लिये बिना ही परमार्थकी— मोक्षकी आशा करता है, वह तो मानो बरसते हुए बादलकी बूँदको पकड़कर आकाशमें चढ़ना चाहता है (अर्थात् जैसे वर्षाकी बूँदको पकड़कर आकाशपर चढ़ना असम्भव है, वैसे ही रामनामका जप किये बिना परमार्थकी प्राप्ति असम्भव है) ॥ २० ॥ तुलसी हठि हठि कहत नित चित सुनि हित करि मानि । लाभ राम सुमिरन बड़ो बड़ी बिसारें हानि ॥ २१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी नित्य-निरन्तर बड़े आग्रहके साथ कहते हैं कि हे चित्त ! तू मेरी बात सुनकर उसे हितकारी समझ। रामका स्मरण ही बड़ा भारी लाभ है और उसे भुलानेमें ही सबसे बड़ी हानि है ॥ २१ ॥
२० दोहावली बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु ॥२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तू कुसङ्गतिको और चित्तके सारे बुरे विचारोंको त्यागकर रामका बन जा और उनके नामका जप कर। ऐसा करनेसे तेरी अनेकों जन्मोंकी बिगड़ी हुई स्थिति आज अभी सुधर जा सकती है ॥२२॥ प्रीति प्रतीति सुरीति सों राम राम जपु राम। तुलसी तेरो है भलो आदि मध्य परिनाम ॥२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तुम प्रेम, विश्वास और विधिके साथ (नामापराधोंसे बचते हुए) राम-राम-राम जपो; इससे तुम्हारा आदि, मध्य और अन्त तीनों ही कालोंमें कल्याण है ॥२३॥ दंपति रस रसना दसन परिजन बदन सुगेह। तुलसी हर हित बरन सिसु संपति सहज सनेह ॥२४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रस (रामनामका उच्चारण करते समय जिस मिठासका अनुभव होता है) और रसना (जीभ) पति-पत्नी हैं, दांत कुटुम्बी हैं, मुख सुन्दर घर है, श्रीमहादेवजीके प्यारे 'र' और 'म'—ये दोनों अक्षर दो मनोहर बालक हैं और सहज स्नेह ही सम्पत्ति हैं (परमार्थ-साधककी ऐसी ही गृहस्थी होनी चाहिये) ॥२४॥ बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास। रामनाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥२५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा-ऋतु है, उत्तम सेवकगण (प्रेमी भक्त) धान हैं और रामनामके दो सुन्दर अक्षर ('र' और 'म') सावन-भादोंके महीने हैं (अर्थात्
दोहावली २१ जैसे वर्षा-ऋतुके श्रावण, भाद्रपद—इन दो महीनोंमें धान लहलहा उठता है, वैसे ही भक्तिपूर्वक श्रीरामनामका जप करनेसे भक्तोंको आत्यन्तिक सुख मिलता है) ॥ २५ ॥ राम नाम नर केसरी कनक कसिपु कलिकाल । जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल ॥२६॥ भावार्थ—श्रीरामनाम नृसिंहभगवान् हैं, कलियुग हिरण्यकशिपु है और श्रीरामनामका जप करनेवाले भक्तजन प्रह्लादजीके समान हैं जिनकी वह (रामनामरूपी नृसिंहभगवान्) देवताओंको दुःख देनेवाले हिरण्यकशिपुको (भक्तिके बाधक कलियुगको) मारकर रक्षा करेगा ॥ २६ ॥ राम नाम कलि कामतरु राम भगति सुरधेनु । सकल सुमंगल मूल जग गुरुपद पंकज रेनु ॥२७॥ भावार्थ—कलियुग में रामनाम मनचाहा फल देनेवाले कल्पवृक्षके समान है, रामभक्ति मुंहमांगी वस्तु देनेवाली कामधेनु है और श्रीसद्गुरुके चरणकमलकी रज संसारमें सब प्रकारके मङ्गलोंकी जड़ है ॥ २७ ॥ राम नाम कलि कामतरु सकल सुमंगल कंद । सुमिरत करतल सिद्धि सब पग पग परमानंद ॥२८॥ भावार्थ—श्रीरामका नाम कलियुगमें कल्पवृक्षके समान है और सब प्रकारके श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ मङ्गलोंका परम सार है। रामनामके स्मरणसे ही सब सिद्धियाँ वैसे ही प्राप्त हो जाती हैं, जैसे कोई चीज हथेलीमें ही रक्खी हो और पद-पदपर परम आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥
१२ दोहावली जथा भूमि सब बीजमय नखत निवास अकास । राम नाम सब धरममय जानत तुलसीदास ॥२९॥ भावार्थ—जैसे सारी धरती बीजमय है, सारा आकाश नक्षत्रोंका निवास (नक्षत्रमय) है, वैसे ही रामनाम सर्वधर्ममय है—तुलसीदास इस रहस्यको जानते हैं ॥ २९ ॥ सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन । नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन ॥३०॥ भावार्थ—जो समस्त (भोग और मोक्षकी भी) कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामजीके भक्तिरसमें डूबे हुए हैं, उन (नारद, वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास आदि) महात्माओंने भी रामनामके सुन्दर प्रेमरूपी अमृत-सरोवरमें अपने मनको मछली बना रक्खा है (अर्थात् नामामृत- के आनन्दको वे क्षणभरके लिये भी त्यागनेमें मछलीकी भाँति व्याकुल हो जाते हैं) ॥ ३० ॥ ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि । राम चरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥३१॥ भावार्थ—[निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] रामसे भी रामनाम बड़ा है, वह वर देनेवाले देवताओंको भी वर देनेवाला है। महान् ईश्वर श्रीशंकरजीने इस रहस्यको मनमें समझकर ही रामचरित्रके सौ करोड़ श्लोकोंमेंसे [चुनकर दो अक्षरके इस] रामनामको ही ग्रहण किया ॥ ३१ ॥ सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ । नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ ॥३२॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीने तो शबरी, [गीधराज] जटायु आदि अपने श्रेष्ठ सेवकोंको ही सुगति दी; परंतु रामनामने तो असंख्य
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Line 8: खजाना बन जाता है॥ ३३॥
Line 9: लंक बिभीषन राज कपि प... मारुति खग मीच ।
Above प... in line 8 is: जाता है!
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Line 7: ...समस्त सद्गुणों और श्रेष्ठ मङ्गलोंका
Line 8: खजाना बन जाता है ॥ ३३ ॥
खजाना is under रामनामका स्मरण
बन is under करते ही
जाता is under समस्त
है॥ is under सद्गुणों
Line 9:
लंक is under खजाना
बिभीषन is under `
२४ दोहावली अभागे मनुष्यको भी परम भाग्यवान् बना देता है ॥ ३६ ॥ जल थल नभ गति अमित अति अग जग जीव अनेक । तुलसी तो से दीन कहँ राम नाम गति एक ॥३७॥ भावार्थ—जगत्में चर-अचर अनेक प्रकारके असंख्य जीव हैं और चरोंमें कुछ ऐसे हैं जिनकी जलमें गति है; कुछकी पृथ्वीपर गति है और कुछकी आकाशमें गति है; परंतु हे तुलसीदास ! तुझ-सरीखे दीनके लिये तो रामनाम ही एकमात्र गति है ॥ ३७ ॥ राम भरोसो राम बल राम नाम बिस्वास । सुमिरत सुभ मंगल कुसल माँगत तुलसीदास ॥३८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी यही माँगते हैं कि मेरा एकमात्र रामपर ही भरोसा रहे, रामहीका बल रहे और जिसके स्मरणमात्रहीसे शुभ, मङ्गल और कुशलकी प्राप्ति होती है, उस रामनाममें ही विश्वास रहे ॥ ३८ ॥ राम नाम रति राम गति राम नाम बिस्वास । सुमिरत सुभ मंगल कुसल दुहुँ दिसि तुलसीदास ॥३९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं—जिसका रामनाममें प्रेम है, राम ही जिसकी एकमात्र गति है और रामनाममें ही जिसका विश्वास है, उसके लिये रामनामका स्मरण करनेसे ही दोनों ओर (इस लोकमें और परलोकमें) शुभ, मङ्गल और कुशल है ॥ ३९ ॥ रामप्रेमके बिना सब व्यर्थ है रसना साँपिनि बदन बिल जे न जपहिं हरिनामु । तुलसी प्रेम न राम सों ताहि बिधाता बाम ॥४०॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जो श्रीहरिका नाम नहीं