भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

१२ दोहावली जथा भूमि सब बीजमय नखत निवास अकास । राम नाम सब धरममय जानत तुलसीदास ॥२९॥ भावार्थ—जैसे सारी धरती बीजमय है, सारा आकाश नक्षत्रोंका निवास (नक्षत्रमय) है, वैसे ही रामनाम सर्वधर्ममय है—तुलसीदास इस रहस्यको जानते हैं ॥ २९ ॥ सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन । नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन ॥३०॥ भावार्थ—जो समस्त (भोग और मोक्षकी भी) कामनाओंसे रहित हैं और श्रीरामजीके भक्तिरसमें डूबे हुए हैं, उन (नारद, वसिष्ठ, वाल्मीकि, व्यास आदि) महात्माओंने भी रामनामके सुन्दर प्रेमरूपी अमृत-सरोवरमें अपने मनको मछली बना रक्खा है (अर्थात् नामामृत- के आनन्दको वे क्षणभरके लिये भी त्यागनेमें मछलीकी भाँति व्याकुल हो जाते हैं) ॥ ३० ॥ ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि । राम चरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥३१॥ भावार्थ—[निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] रामसे भी रामनाम बड़ा है, वह वर देनेवाले देवताओंको भी वर देनेवाला है। महान् ईश्वर श्रीशंकरजीने इस रहस्यको मनमें समझकर ही रामचरित्रके सौ करोड़ श्लोकोंमेंसे [चुनकर दो अक्षरके इस] रामनामको ही ग्रहण किया ॥ ३१ ॥ सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ । नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ ॥३२॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीने तो शबरी, [गीधराज] जटायु आदि अपने श्रेष्ठ सेवकोंको ही सुगति दी; परंतु रामनामने तो असंख्य