दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ११ ] विषय पृष्ठ-संख्या १६२-नीतिका अवलम्बन और श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम ही श्रेष्ठ है १५७ १६३-विवेकपूर्वक व्यवहार ही उत्तम है १५७ १६४-नेमसे प्रेम बड़ा है १५८ १६५-किस-किसका परित्याग कर देना चाहिये १५८ १६६-सात वस्तुओंको रस बिगड़नेसे पहले ही छोड़ देना चाहिये १५८ १६७-मनके चार कण्टक हैं १५९ १६८-कौन निरादर पाते हैं? १६० १६९-पाँच दुःखदायी होते हैं १६० २००-समर्थ पापीसे वैर करना उचित नहीं १६० २०१-शोचनीय कौन है ? १६१ २०२-परमार्थसे विमुख ही अंधा है १६१ २०३-मनुष्य आँख होते हुए भी मृत्युको नहीं देखते १६२ २०४-मूढ़ उपदेश नहीं सुनते १६२ २०५-बार-बार सोचनेकी आवश्यकता १६३ २०६-मूर्खशिरोमणि कौन है? १६३ २०७-ईश्वरविमुखकी दुर्गति ही होती है १६३ विषय पृष्ठ-संख्या २०८-जान-बूझकर अनीति करनेवालेको उपदेश देना व्यर्थ है १६४ २०९-जगत्के लोगोंको रिझानेवाला मूर्ख है १६४ २१०-प्रतिष्ठा दुःखका मूल है १६५ २११-भेड़ियाधंसानका उदाहरण १६६ २१२-ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं १६६ २१३-नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते हैं १६८ २१४-राजाको कैसा होना चाहिये ? १७० २१५-राजनीति १७१ २१६-किसका राज्य अचल हो जाता है ? १७३ २१७-आज्ञाकारी सेवक स्वामी- से बड़ा होता है ? १७७ २१८-मूलके अनुसार बढ़ने- वाला और बिना अभि- मान किये सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है १७७